Zahar Bujha Satya

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If you have Steel Ears, You are Welcome!

गुरुवार, अप्रैल 19, 2018

Science of Love | Shubhanshu


यह आसानी से समझा जा सकता है कि क्यों लोग (प्रेमी जोड़े या पति-पत्नी) एक दूसरे को कुछ समय बाद छोड़ देते हैं!

क्योकि इंसान मौलिक रूप से बहु-आकर्षण क्षमता वाला (polyandrous/polygamous leaning) जीव होता है, वैसे अधिकांश स्तनधारी जीव ऐसे ही होते हैं तो कुछ नया नहीं है। विवाह का अर्थ सेक्स होता है विज्ञान में और लोगों की राय में भी, तो इस प्रवृत्ति को समझने के लिए मानव के वास्तविक उद्विकास (evolution) को देखना होगा।

दुनिया मे सबसे सम्भोग नहीं किया जा सकता लेकिन जितनों से भी कर लिया जाए, ये मानव का मूलभूत प्रयास रहता है। क्योंकि न तो हर एक सम्भोग में बच्चे हो सकते हैं और न ही हर जन्तु प्रजनन क्रिया करने में सफल ही हो पाता है।

मानवों में तो यह इसलिए भी बेमौसम होता है क्योंकि एक महिला सीमित अंडे पैदा करने की क्षमता लेकर दुनिया में आती है और माह में केवल कुछ दिन ही प्रजनन योग्य स्थिति में होती है, जो सामान्यतः 28 दिन के चक्र में 14वें दिन के आसपास का समय होता है। बच्चे होने की सम्भावित अवधि अंडोत्सर्ग (ovulation) से कुछ दिन पहले और कुछ दिन बाद तक की होती है (जिसे फर्टाइल विंडो कहते हैं)। अंडोत्सर्ग वाले दिन गर्भधारण की सम्भावना अत्यधिक प्रबल होती है और जैविक रूप से महिला इसी समय सम्भोग के प्रति वास्तविक रूप से लालायित होती है। उसकी योनी में श्लेष्मा का स्राव अधिक होने से सम्भोग की इच्छा अपने आप जागृत हो जाती है। इस अवधि में यदि वीर्य योनी से गर्भाशय में पहुचता है तो निषेचन की प्रक्रिया होगी अन्यथा यह अंडा नष्ट हो जाएगा। इसी प्रक्रिया के चक्र को माहवारी कह कर सम्बोधित करते हैं।

अब सवाल उठता है कि कैसे पता चले कि अन्डोत्सर्ग वाला दिन कौन सा है? आधुनिक सभ्यता में यह आसानी से पता नहीं लगाया जा सकता क्योंकि समाज ने माहवारी को गंदा-घिनौना बता कर पूरी तरह छिपा दिया है। प्राचीन या आदिम समाजों में माहवारी का चक्र पूरी तरह दृश्य (visible) होता था, जिससे दिनों की गिनती करके अंडोत्सर्ग के समय का अनुमान लगाया जा सकता था। लेकिन अब सैनिटरी उत्पादों और सामाजिक वर्जनाओं के माध्यम से इस पूरे चक्र को 'अदृश्य' कर दिया गया है।

इससे दाग न लग जाए, इसलिए लोग आज भी गंदा कपड़ा इस्तेमाल करना उचित समझते हैं। सेनेटरी पैड महंगा जो है। अरे हाँ 2 रूपये वाला भी आ गया है। लेकिन सिर्फ फिल्म में। अब आ गया है पारंपरिक विज्ञापनों से बढ़ कर चमत्कारी मेंस्ट्रुअल कप का दौर। 150 रुपए से लेकर 2000 रुपए तक की प्रारम्भिक खर्च के बाद 5 से 10 वर्ष तक माहवारी और कपड़े, सेनेटरी पैड से छुट्टी मिल जाती है।

चूंकि आधुनिक समाज में इस चक्र के सारे संकेत पूरी तरह छिपे हुए हैं, इसलिए पुरुष निश्चित तौर पर नहीं जानता कि प्रजनन का सटीक दिवस कब है। परिणामस्वरूप, पुरुष के भीतर हर समय सम्भोग की इच्छा जागृत रहती है ताकि कोई भी अवसर चूके नहीं।

ये मानव दिमाग मे भरा हुआ है (coded in gene) कि ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा किये जायें ताकि मानव जाति या कोई भी जाति (अन्य जीवों के मामले में) बची रहे। इस प्रावस्था को natalism कहते हैं।

प्रकृति में ये ऐसा इसलिये था क्योंकि जब विवाह नहीं था और विज्ञान नहीं था तो सभी मानव बहुत कम समय तक जी पाते थे (अन्य जंतुओं की तरह)।

ऐसे में सिर्फ वही प्रजाति जीवित बची रह सकी जो ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने में सफल हुई। उद्विकास (evolution) के दौरान केवल वही मानव जीवित बचे जो सम्भोग करने में और अधिक बच्चे पैदा करने में ज्यादा सफल हुए।

इन मानवों में सम्भोग के प्रति बहुत तीव्र इच्छा थी और इसी कारण ये यहाँ तक पहुच सके। यही तीव्र इच्छा आज के मेडिकल साइंस के आ जाने के कारण जनसँख्या बढ़ाने की ज़िम्मेदार कहलाई क्योकि अब लोग चिकित्सा विज्ञान के कारण कम मरते हैं।

लेकिन इंसान की प्रवृत्ति (instinct) नहीं बदली। वह वैसी ही रह गई।

लोगों ने इस प्रवृत्ति को बदलने के लिये monogamy (एकल विवाह) को अनिवार्य बनाया ताकि समाज मे धन का विनिमय करने के लिये मजदूर मिल सकें और प्रति व्यक्ति परिवार के होने के कारण बच्चों का पालनपोषण सुनिश्चित हो सके। इस प्रकार जनसँख्या तीव्र गति से बढ़ने लगी। समाज की अर्थव्यवस्था को चलाने के लिये मोनोगैमी काम आई और एक व्यक्ति से विवाह बहुत प्रसिद्ध हुआ।

लेकिन इसके दुष्परिणाम भी समय के साथ सामने आने लगे। एक समाज एक निश्चित स्थान पर स्थित परिवार के समान होता है। प्रायः समाज एक शहर, राज्य या एक देश तक सीमित होता है। संगठित रूप में यह एक समुदाय के रूप में होता है। इसकी एक निश्चित सीमा होती है, निश्चित संसाधन (resources) होते हैं और उनकी जीवटता उन्हीं पर निर्भर होती है। अर्थात यदि संसाधनों में कमी आयी तो समाज में समस्याएं आनी तय हैं।

उदाहरण 1: एक छोटे शहर में 50 घर हैं। वे लोग वर्तमान परिस्थितियों में 60 घरो का खर्च उठा सकें इतना ही कमाते हैं। यानी अभी इसमें 10 और घर बसाए जा सकते हैं। लेकिन जगह की कमी है। इसलिये वह संख्या 50 से आगे कभी नहीं बढ़ सकती। यह 10 घरों की अतिरिक्त राशि सभी परिवार आंशिक रूप से अपने भविष्य की विकट परिस्थितियों (आपातकाल) के लिये सुरक्षित रखते हैं।

लेकिन जनसँख्या समानुपातिक ढंग से बढ़ रही है। कारण है नेटालिस्टिक भावना और संस्कृति द्वारा इसके सन्दर्भ में बनाये गये विवाह और शीघ्र बच्चों को पैदा करने जैसे अनिवार्य व्यवहार/परम्पराएं।

नतीजा साफ है। अतिरिक्त लोग संसाधनों की कमी के कारण सड़कों पर भिखारी, बेकार और बेरोजगार बनकर जीवन गुजारने लगे हैं। इससे उन 50 घरों को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, उनका जमा धन इस असंतुलन को कुछ समय तक संभालता है, लेकिन धीरे-धीरे यह स्थिति व्यवस्था में विकृतियों को जन्म देती है。

उदाहरण 2: उपर्युक्त उदाहरण में एक नियमित समन्वय दिखाया गया है जब परिस्थिति नियंत्रण में है। अब आती है अनियंत्रित परिस्थिति (वर्तमान)। वर्तमान समय में चिकित्सा विज्ञान उत्तरोत्तर प्रगति कर चुका हैं। असाध्य रोग और समस्याएं सुलझाई जा रही हैं। जनसंख्या नियंत्रण खतरे में है। इंसान की औसत आयु बहुत बढ़ गई है जो भविष्य में और ऊपर जा सकती है।

अब क्या होगा? सीमित जगह, सीमित संसाधन, सीमित स्थान लेकिन अधिक आबादी।

  1. बच्चे: मम्मी-पापा का कमरा खाली हो जाता तो उनके पोते-पोतियों को दूसरे शहर में ऋण लेकर नया घर न लेना पड़ता।
  2. पोते-पोती: ये बुजुर्ग मरते क्यों नही? सम्पत्ति की ज़रूरत है और ये कुंडली मारे बैठे हैं।
  3. बैंक: 100 साल तक ही पेंशन मिलेगी। उसके बाद भी जिंदा रहे तो कुछ और जुगाड़ ढूंढना होगा।

जब लोग ज्यादा और संसाधन कम होंगे तो क्या होगा? सब एक दूसरे का मुहँ ताकना शुरू।

अब क्या करें? फिर से मौत पीछे? फिर क्या फायदा जीकर जब जीने को साधन नहीं। फिर से आदिमकाल शुरू। फिर से संघर्ष? फिर से एक दूसरे से छीनने का दौर शुरू। हिंसात्मक दृश्य। सब लड़-भिड़ के पुनः समाप्ति की ओर। यह क्या? तो क्या करें? बच्चे न पैदा करें? नेटालिस्टिक प्रवृत्ति का लोप कर दें? तब anti-natalist समाज समाप्ति की ओर नहीं बढ़ जाएगा? मानव जाति समाप्त नहीं हो जाएगी?

चलिये देखते हैं। अभी बात हुई थी कि पोलिगेमस मानव को सदियों से मोनोगेमस बनाये जाने का प्रयास किया गया। लेकिन फिर भी इसका उल्लंघन हुआ। वैश्विक स्तर पर जब पितृत्व परीक्षणों (paternity tests) के सांख्यिकीय डेटा को देखा जाता है, तो कई ऐसे मामले सामने आते हैं जहाँ सामाजिक पिता और जैविक पिता अलग निकलते हैं, जिससे पारंपरिक रूप से शुद्ध वंश चलाने के दावों पर गहरा प्रश्नचिह्न लग जाता है।

वास्तव में वंश चलाने के आनुवंशिक (genetic) मायने बिल्कुल अलग हैं। विज्ञान के नियम के अनुसार, यदि माता-पिता एक ही करीबी रक्त सम्बन्धी होंगे, तो 'इनब्रीडिंग डिप्रेशन' के कारण वंश शुद्ध नहीं बल्कि कमजोर और गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाएगा। और यदि माता-पिता अलग परिवारों से हैं, तो संतान में गुणसूत्रों का आधा हिस्सा (46 में से 23) माता के वंश का and आधा पिता के वंश का आता है। यानी शुद्ध रूप से केवल एक ही लीनियज का प्रवाह व्यावहारिक तौर पर एक सामाजिक कल्पना मात्र है।

तो क्या सीखा? मतलब प्रवृत्ति पर पूरी तरह रोक लगाना असम्भव। इसलिये मोनोगैमी की तरह एन्टी नेटालिस्ट सोच लाइये। जनसँख्या को स्वेच्छा से रोकिये। गर्भनिरोधकों का जम कर उपयोग करें। सरकार का सहयोग लें। कंडोम, नसबंदी, मैथुन भंग, डायफ्राम, आईयूडी (आधुनिक और सुरक्षित 3 से 5 वर्ष तक), copper T, फीमेल कंडोम, आपातकालीन गर्भनिरोधक गोलियां, सहेली, डिम्पा इंजेक्शन इत्यादि का विकल्प चुनें। अनजान साथी से सम्भोग करते समय कंडोम प्रयोग करें या उसकी STD/HIV जांच अवश्य करवा लें।

कुछ लोग इस बात को कभी नहीं मानेंगे और जो विवाह को त्यागेंगे वे live-in-relationship में बच्चे पैदा करेंगे ही और जनसँख्या संतुलित हो जाएगी।

अब बात आती है कि यदि इंसान असल में बहु-आकर्षण क्षमता वाला है, तो यह प्यार किस चिड़िया का नाम है? क्यों वह एक के साथ चिपक जाता है?

इसका मुख्य कारण यह है कि इंसान खाली नहीं बैठ सकता। इसलिये उसे कोई न कोई काम चाहिए। कुछ नहीं तो मनोरंजन या गप शप करने के लिये ही सही, एक साथी। ये बात सिर्फ इंसान के लिये ही सही नहीं है। लगभग सभी जीव-जंतु ऐसा ही करते हैं। उनको भी कोई न कोई चाहिए ताकि अपना फालतू समय काट सकें। जिनको यह साथी नहीं मिल पाता वे या तो निर्जीव वस्तुओं से मनोरंजन करते हैं। जैसे खेल इत्यादि या वे सोते रहते हैं।

इस प्रकार जो आनन्द प्राप्त होता है, उससे सभी के मस्तिष्क से डोपामिन, सेरोटोनिन, ऑक्सीटोसिन तथा एंडोर्फिन्स हार्मोन निकलता है जो एडिक्टिव (जिसकी लत लग जाती है) होता है। इनके अतिरिक्त विशेष प्रकार के शरीर से जोड़ रखने वाले फेरोमोन भी होते हैं जो मानव की পसीने की ग्रन्थियों से स्रावित होते हैं। यह ऐसे गुण रखते हैं जो केवल नाक के विशेष ग्राहियों (receptors) को ही महसूस होते हैं। जिनको आप पहचान नहीं सकते अर्थात गन्धहीन होते हैं। यह सीधे कामोत्तेजना पैदा कर सकते हैं। इसी के कारण पहली ही मुलाकात में तीव्र आकर्षण पैदा होता है। भाई-बहन-माता-पिता-पुत्री-पुत्र के फेरोमोन समान होने के कारण उनमें इनका प्रभाव हल्का होता है। लेकिन साफसफाई से रहने के कारण यह फेरोमोन अब निष्प्रभावी हो गए। विपरीत फेरोमोन एक दूसरे को आकर्षित and समान प्रतिकर्षित करते हैं।

प्राचीन काल में पसीने की गंध सेक्स का turn on होती थी। लेकिन आज डिओडरेंट ने इसको एक बुराई में बदल दिया है। अब बैक्टीरिया जनित मल की गंध को साफ करने के चक्कर में असली फेरोमोन भी ख़त्म रहे हैं।

इसी लत को प्यार/love/मोहब्बत/इश्क/प्रेम कहते हैं। ये किसी भी चीज से हो सकता है। जिससे भी आनन्द की प्राप्ति हो। परंतु संभोग की इच्छा ऑक्सीटोसिन and डोपामिन का मिला जुला प्रभाव होती है जिसमें ऑक्सीटोसिन love को बढाने वाला addictive हार्मोन कहा जाता है। इसके प्रभाव से यौनांगों का विकास शीघ्र हो जाता है। यह माता में दुग्ध उत्पादन में भी सहयोग करता है।

आवश्यकतानुसार इसमें भेद भी उत्पन्न हुए और जब मानव समाज रिश्ते बना रहा था तो उसने प्रेम को तरह-तरह के भेदों में बांट लिया।

माता-पिता का प्यार, भाई-बहन का प्यार, रिश्तेदारों का प्यार, दोस्तों का प्यार, शिक्षक and विद्यार्थियों का प्यार और सबसे महत्वपूर्ण, रोमांस वाला प्यार, आकर्षण का सुख, कामोत्तेजना का आनन्द, संभोग का आनंद।

सम्भोग का आनंद एक ऐसा आनंद है जिसके कारण प्रजनन की भावना जीवित है। यह सभ्यता के साथ-साथ मनोरंजन में बदल गया। इसी के चलते बहु-आकर्षण का स्वभाव फलाफूला। इसे आम भाषा में हवस (lust) कहते हैं। यह डोपामिन and ऑक्सीटोसिन का मिला जुला प्रभाव हैं। यह एक सम्पन्न समाज में एक व्यवस्था यानी वैश्यावृत्ति and पोर्न बन कर उभरा। बहु-आकर्षण प्रवृत्ति वाले पुरुषों ने सत्ता में आकर नगर वधु का चलन शुरू किया। नाम से ही स्पष्ट है कि सारे नगर की पत्नी। यह व्यवस्था समय के साथ पूरे तंत्र में फैल गई। कारण वही, एक बार से दिल नहीं भरता। आखिर क्यों एक साथी से दिल नहीं भरता?

कुछ लोगों ने इन अंतर्विरोधों के चक्कर में अपने प्राथमिक संबंधों की ईमानदारी को दांव पर लगा दिया।

प्रश्न: इन वैश्याओं के बच्चों का क्या होता है? उत्तर: इतिहास and समाज के काले पन्नों में शोषण and कत्ल की कई डरावनी कहानियां आज भी दर्ज हैं।

ऐसा पाया गया है कि एक ही साथी से सम्भोग करते-करते कई बार कामोत्तेजना का वह शुरुआती स्तर समाप्त हो जाता है and बोरियत होने लगती है। दवाओं के अत्यधिक and अनियंत्रित प्रयोग के अपने गंभीर शारीरिक दुष्परिणाम हैं।

नया साथी देखते ही या सिर्फ जगह/स्थान/रोल बदलने से भी कुछ समय तक ये बंद कलियाँ खिलने लगती हैं। यह पूरी तरह से न्यूरोकेमिकल बदलावों and डोपामिन रीसेट का खेल है।

प्रारम्भ में केवल विपरीत लिंग के लोगों में ही रोमांस सम्भव माना जाता था परंतु कालांतर में इसके अन्य भेद भी सामने आए। जैसे LGBTQ (Lesbian, Gay, Bisexual, Transgender, Queer)।

इन सभी रोमांटिक प्रेमों के खिलाफ धर्म and कानूनों ने व्यापक मुहिम छेड़ दी। इतिहास में अनगिनत जोड़ों को प्रताड़ित किया गया या मार डाला गया, उनके ही अपने घरवालों के द्वारा, या जो जोड़े नहीं मार पाए गए, उनको बाकायदा पापी घोषित करके कत्ल कर दिया गया।

क्यों? बहुत कड़वा जवाब है इस क्यों का।

तो चलो कुछ सवालों का जवाब ढूंढते हैं पहले: विवाह जो समर्थन प्राप्त संस्था है, उसकी सामान्य विधि क्या है?

  1. अपनी ही जाति and स्टेटस वाले, सुदंर चेहरे वाले या उनसे ऊपर के खानदान से बात चलाई जाती है।
  2. यदि बात नहीं बनती तो कम से कम में जो भी मानक पूरे करता हो उसके साथ रिश्ता पक्का किया जाता है।
  3. धन का लेनदेन शुरू।
  4. विवाह के उम्मीदवारों से या तो कुछ नहीं पूछा जाता है या फ़ोटो दिखा कर या आमने-सामने बिठा कर परिचय करवा देते हैं। ज्यादा सम्पन्न हैं तो आपस में फोन पर बातचीत भी होती है।
  5. फिर उचित समय निर्धारित करके, विवाह समारोह आयोजित किया जाता है जिसमे ज्यादा से ज्यादा लोगों को, अपना स्टेटस दिखाने and जान पहचान बढ़ाने के लिये, तथा नेग/उपहार रूपी धन की वापसी की उम्मीद में, बुलाया जाता है।

इनकी आव-भगत की जाती है, वर पक्ष and वधू पक्ष के तमाम लोग इस तमाशे में शामिल होते हैं। भारी धन हानि होती है। महंगे परिधानों में लोग आकर गरिष्ठ and महंगा भोजन करते हैं and भरी हुई प्लेट कूड़े के ढेर में फेंक देते हैं।

  1. इस सब के बाद या पहले (परम्परानुसार) विवाह की रस्म होती है। जिसमे कोई धार्मिक पुजारी/काजी/मुल्ला/पादरी आकर वर and वधु को सैकडों लोगों की मौजूदगी में जीवन भर साथ रहने की शपथ दिलवाता है and परलौकिक डर दिखाता है कि यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया तो बुरा होगा। सभी लोग इस agreement के गवाह बनते हैं and इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी करा ली जाती है।
  2. सम्भोग रात्रि (सुहाग रात): दो अनजान लोग सीधे शारीरिक स्तर पर जुड़ते हैं। समाज बिना पर्याप्त फोरप्ले and मानसिक तैयारी के इस प्रथम शारीरिक संबंध को मौन सहमति मान लेता है।

बिना उचित मानसिक and शारीरिक तत्परता के यह प्रक्रिया अक्सर दमन and असंतोष को जन्म देती है। पारंपरिक सोच में फोरप्ले की महत्ता को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है, जिससे वैवाहिक जीवन की शुरुआत ही गलत बुनियाद पर होती है। कानून भी इसी सामाजिक सोच से प्रभावित रहता है, यही कारण है कि वैवाहिक बलात्कार (marital rape) जैसे गंभीर मुद्दों पर कानूनी पेंच फंसे रहते हैं。

इतनी बड़ी परियोजना केवल 2 लोगों के बच्चे पैदा करने के लिये नहीं है, बहुत बड़ी सामाजिक संरचना है इसके पीछे।

ये सब इसलिये ताकि कोई भी अपनी मर्जी से विवाह न कर ले। एक विवाह एक व्यापारी के लिए विज्ञापन, एक कारपोरेट के लिये नए व्यापार के लिये रास्ते खोलने वाला and बड़े लोगो से सम्पर्क बनाना हो सकता है।

धर्म को क्या फायदा है? जितने ज्यादा कमाने वाले होंगे उतना ज्यादा दान। उतने ज्यादा नामकरण, यग्योपवीत संस्कार, मुंडन, इत्यादि 16 संस्कारों में धन कमाने का अवसर। And फिर खानदानी लॉयल्टी।

अब अगर उन माता-पिता के बच्चे खुद ही अपना जीवन साथी चुन लेंगे तो उनके इस प्लान का क्या होगा?

भारत के परिपेक्ष्य में:

वधू पक्ष: एक तो लड़की को घर से विदा कर दिया जबरन and फिर रोने का नाटक भी। ज़िन्दगी भर अपमान करवाने and ससुराल वालों के नखरे and फरमाइशों को पूरा करने का वादा भी कर लिया। दान देने वाला बाप छोटा and लेने वाला बड़ा।

वर पक्ष: एक तो लड़की ले आये दूसरे की खा पी कर, साथ में पैसा भी ले आये, फिर भी दहेज चाहिए? नहीं दें तो परिणति प्रताड़ना, दुर्घटना या आत्महत्या के रूप में सामने आती है।

यदि दहेज की मांग पूरी करते रहे तो वधू पक्ष गरीबी में जीवन जीता है and अपनी ही संतान या किस्मत को कोसता है।

उधर वर-वधु का जीवन:

पति: 1. तू लाई ही क्या थी? ये दो कौड़ी का सामान? 2. तेरे बाप ने तुझे यही सिखा पढ़ा के भेजा है कि तू हमसे जुबान लड़ाती है? 3. अब तेरे में वो पहले वाली बात नहीं रही, अब तेरे साथ मज़ा नहीं आता Lights? 4. आफिस में अपनी जूनियर के साथ नया आकर्षण ढूंढना। 5. घरवाली and बाहरवाली दोनों को रखने की चाहत।

सास: 1. अरे करमजली, फिर दूध जला दिया, यही सिखा कर भेजा है तेरी माँ ने? 2. नाश्ता टाइम पर चाहिए, अभी तेरे बाप को बुलाती हूँ ठहर जा। 3. पोछे का पानी अब तक नहीं सूखा? मार डालने का प्लान है। 4. लड़का कब देगी तू?

ससुर: 1. बहू, ज़रा मेरा भी थोड़ा ध्यान रख लिया कर, मेरे कपड़े, सामान वगेरह का ध्यान तुमको ही रखना है अब।

बहू: 1. एक आदमी से शादी की थी, ये तो पूरा कुटुंब ही पल्ले पड़ गया। क्या क्या कर लूँ अकेले? 2. इज़्ज़त तो कोई है नहीं, नौकर बन कर जीना पड़ रहा है। 3. संतान के लिंग निर्धारण में मेरा क्या वश? 4. मैं कहाँ फंस गई? 5. साथी की शारीरिक अक्षमता या कम समय टिकने के कारण अतृप्ति। 6. कुटुंब के अन्य पुरुषों की गलत नजर। 7. सामाजिक बंधनों के कारण चुप रहकर घुटते जाना।

ऑफिस की जूनियर: शोषण की स्थिति में समाज कामकाजी महिलाओं को ही संदेहास्पद नजर से देखता है। व्यवस्था ऐसी है कि विरोध करने पर नौकरी या तरक्की दांव पर लग जाती है, इसलिए अक्सर मौन रहकर समझौता करना ही अंतिम विकल्प मान लिया जाता है।

परिणाम: विवाह सफल! बधाई हो। लड़का हुआ है।

गुलामी स्वीकार कर लो तो कोई दिक्कत नहीं है। लड़की समाज के पांव की जूती ही तो है। लड़की का तो नाम ही समर्पण है। बोले तो आत्मसमर्पण (surrender)।

विरोध किया तो समस्या शुरू। समाज कहता है कि विरोध मत करो। तो मत करिए, जो चलता है चलने दिया जाए।

इस सब का विरोध शुरू से क्यों नहीं हुआ? क्योकि इसको चलाने में धर्म का बहुत बड़ा हाथ था जिसके डर से लोगों ने विरोध नहीं किया।

"लड़की की अब लाश ही वापस आएगी।" "पति का घर ही अब उसका घर है।"

इसी तरह लोग अपनी वास्तविक प्रवृत्ति को छुपा कर जीने लगे, अपने बहु-आकर्षण स्वभाव को दबाए रहे, लेकिन समय बदला and इसके बुरे परिणाम सामने आने लगे, क्योकि इंसान अपनी बुनियादी सहज प्रवृत्तियों (instincts) को पूरी तरह ख़त्म नहीं कर सकता। इसी दमनकारी, स्वामित्ववादी and यौन रूप से पाखंडी सामाजिक ढांचे के कारण गुप्त संबंध, चीटिंग, मानसिक हिंसा and यौन कुंठाएं समाज में फैलती गईं।

विवाहेतर सम्बन्ध and घरेलू हिंसा सब अवैध कहलाने के डर से चुप चाप होने लगीं। समाज के ठेकेदारों ने कड़े नियम and सजाएं बनाईं, लेकिन पाखंडी ढांचे में कोई बुनियादी सुधार नहीं हुआ।

आज भी यही हो रहा है। वैवाहिक जीवन में अक्सर यौन इच्छाएं एकतरफा थोपी जाती हैं, जहाँ आपसी सहमति या महिला की अपनी कामुकता की अभिव्यक्ति को ही वर्जित या गलत मान लिया जाता है। जो लोग खुले तौर पर व्यवस्था का विरोध नहीं कर पाते, वे छिपकर शॉर्ट-टर्म संबंध (gf-bf) बनाने लगते हैं। वहाँ भी कई बार भावनात्मक ब्लैकमेल या सहमति की सीमाओं का उल्लंघन देखा जाता है। And समाज का सबसे आसान तरीका देखिए—ऐसी किसी भी असहज स्थिति या विवाद से बचने के लिए लड़की से समझौता करके शादी करवा दी जाती है, भले ही बाद में तलाक की नौबत आ जाए या घरेलू हिंसा का दौर शुरू हो।

शारीरिक आकर्षण and वास्तविक मानसिक प्रेम को जबरन मिलाकर एक ही पैकेज बनाने से ही क्लेश and अपराध होते हैं। यौन विशिष्टता (sexual exclusivity) हमेशा वास्तविक निष्ठा की गारंटी नहीं होती, लेकिन मानसिक and भावनात्मक ईमानदारी (transparency) जरूर होती है।

लिव इन रिलेशनशिप दो लोगों का व्यक्तिगत सम्बन्ध है जहाँ किसी बाहरी तंत्र का दखल नहीं होता। यह उन लोगों के लिए एक विकल्प है जो संतान चाहते हैं।

जिनके बच्चे नहीं and अलग/व्यस्त रहते हैं, तो वे अपने बुजुर्गों की देखभाल के लिये पेशेवर and प्रमाणित सहायता (caregivers) की व्यवस्था कर लें, and समाज hospitality and परिवार को भी इस आधुनिक बदलाव को स्वीकारना होगा।

जो Antinatalist Vegans हैं, वे पूरी सहमति, सुरक्षा and पारदर्शिता पर आधारित आधुनिक संबंधों (transparent and safe concepts) को समझें, and सुरक्षित यौन जीवन तथा प्रेम को जिम्मेदारी से प्रबंधित करें। इंसान की स्वभावगत विविधताओं के कारण कोई भी व्यवस्था सब पर जबरन लागू नहीं की जा सकती। यदि यह विनाशकारी प्रजाति स्वेच्छा से प्रजनन रोककर धीरे-धीरे समाप्त होती है, तो यह किसी परमाणु युद्ध या हिंसक विनाश से कहीं बेहतर अंत होगा।

अस्वीकरण: यह व्यक्तिगत सोच है, किसी को बाध्य नहीं किया गया है। वही करें जो दिल कहे। धन्यवाद।

लेखक: Shubhanshu Singh Chauhan 'Vegan'

वंशवाद ~ Shubhanshu

जंतुओं में 90% बच्चे incest से होते हैं। विज्ञान का एक प्रभाग अनुमान लगाता है कि incest से पैदा हुए बच्चे गड़बड़ होते हैं क्योंकि एक ही DNA कई बार टूटता है। बेहतर सन्तति के लिये DNA नवीनीकरण आवश्यक है। परन्तु जंतुओं में हम ऐसा नहीं होते देखते। साथ ही मिस्र के राजवंश जो कि बेहद ज्ञान विज्ञान के रहस्य समेटे हैं वे सभी incest से ही राजवंश चलाते थे।

वंश चलाने की वास्तविक शर्त यह है कि वंश की संतति में किसी और DNA की मिलावट न हो। यह बात मिस्र का राजघराना और ब्रिटेन का राजघराना जानता है। बाकी इस बात से अंजान रहे और एक मिश्रित वंश को अपना वंश कहते रहे। हम सब आज भी इसी गलतफहमी में रहते हैं कि अगर हम किसी अन्य परिवार की लड़की से विवाह/बच्चे करते हैं तो हम अपना वंश आगे बढ़ा रहे हैं। जबकि आने वाला बच्चा आपके और आपकी पत्नी/साथी दोनो का 50-50 प्रतिशत DNA लेकर आता है, अर्थात दो भिन्न लोगों का वंश। एक दूषित वंश।

यही आगे चलकर जब नाती-पोतों तक पहुँचता है तो आपके वंश का बेहद सूक्ष्म अंश मात्र ही भावी सन्तति में शेष रह जाता है। बाकि उसमें दूसरों का DNA ही ज्यादा होता है। इस प्रकार आपकी खूबियाँ या कमियां, जो भी हैं, वह आने वाली सन्तानों में नहीं रहतीं। दूसरों की आ जाती हैं।

पशुओं/जंतुओं में 90% से अधिक incest sex होने के कारण ज्यादा शुद्ध वंश होता है तथा उनके पुरखों के अनुवांशिक लक्षण जस के तस बने रहते हैं। जबकि मानव भिन्न DNA से संयोग (प्रजनन) करके अजीब-अजीब नए प्रयोग कर रहा है। परिणामतः अजीब-अजीब लोग (अच्छे या बुरे) पैदा हो रहे हैं।

यथा-

अच्छा पुरुष + बुरी स्त्री = अच्छा-बुरा बच्चा/बच्ची
अच्छा पुरुष + अच्छी स्त्री = अच्छा बच्चा/बच्ची
मूर्ख पुरुष + बुद्धिमान स्त्री = 50-50% गुण यानी सामान्य बच्चा/बच्ची
बुद्धिमान पुरुष + मूर्ख स्त्री = 50-50% गुण यानी सामान्य बच्चा/बच्ची
सामान्य पुरूष + सामान्य स्त्री = सामान्य बच्चा/बच्ची
सामान्य व्यक्ति + X व्यक्ति = 50-50% सामान्य तथा X गुण।
मूर्ख पुरूष + मूर्ख स्त्री= मूर्ख या महामूर्ख बच्चा/बच्ची
बुद्धिमान पुरुष + बुद्धिमान स्त्री = बुद्धिमान या महाबुद्धिमान बच्चा/बच्ची

जहाँ, X = अच्छा, बुरा, बुद्धिमान, मूर्ख, महामूर्ख, महाबुद्धिमान संयोग आदि।

नोट: अच्छा/बुरा/मूर्ख/बुद्धिमान के पैमाने = एकल व्यक्ति के समस्त गुणों का निष्कर्ष

जबकि incest में -

व्यक्ति के विशेष गुण/अवगुण (अनोखापन) बरकरार रहता है। जैसे:

एक ही माता पिता की सन्तति का बच्चा/बच्ची अपने खानदान की प्रतिकृति होगा। अब या तो मूल पुरखा मूर्ख हो या बुद्धिमान। उसका वंश उसी के गुणों/अवगुणों को आगे बढ़ायेगा और उत्तरोत्तर की उत्तरजीविता के नियम से बचेगा या समाप्त हो जाएगा।

अब वह विज्ञान की चेतावनी किसलिये और किस आधार पर है? वह दरअसल इन्हीं कुछ राजवंशों के वंश बेल का अध्ययन ही है जिसमें कुछ मूर्ख लोग भी थे।

विशेष note: संशोधन का विकल्प खुला है। पूर्णतया स्मृति ज्ञान पर आधारित जानकारी। कोई गलती होने पर सुधारें। ~ शुभाँशु जी 2018©

बुधवार, अप्रैल 18, 2018

चमत्कारी जगत और चमत्कार ~ Shubhanshu

कृपया अपनी अक्ल और मेहनत से अपना जीवन खुशहाल बनाइये।
जादू-टोने-पूजा-पाठ-नमाज-भजन-अरदास-प्रार्थना-आत्मा-पुनर्जन्म-नर्क-जन्नत-हूर आदि बकवास में अपना धन व समय बर्बाद करके खुद को और गड्ढे में न धकेलें।

यह मानसिक रोगियों के दिमाग में पैदा होने वाले हेलुसिनेशन होते हैं जो सकेज़ोफ्रेनिक लोगों को वास्तव में दिखते हैं। उनके चक्कर में आप तो पागल न बनिये।

दिमाग को क्षतिग्रस्त करने के लिये विशेष अगरबत्ती/धूप/यज्ञ आदि पारा व नशा मिश्रण करके बनाई जाती है जो सांस के रास्ते दिमाग में जाकर उसे क्षतिग्रस्त कर देती है और आपको अजीब अजीब अनुभव होने लगते हैं। धार्मिक स्थलों पर अगरबत्ती या किसी भी प्रकार का धुआं/इत्र इत्यादि का और कोई उद्देश्य नहीं है।

प्रशाद इत्यादि में बहुत कम मात्रा में अफीम मिली होती है ताकि आप इसके तलबगार होकर बार-बार आएं।

इसके अलावा बौद्ध सन्यासी एक फूल का प्रयोग भी इसी कार्य के लिये करते हैं। यदि आप इन बाबा-गुरु के पास जाते हैं तो वे आपको इसी प्रकार की चीजों से भृमित कर देते हैं और आपके मस्तिष्क को हमेशा के लिये क्षतिग्रस्त करके हमेशा के लिये बर्बाद कर देते हैं। ज्ञात हो कि सामान्यतः दिमाग की क्षतिग्रस्त कोशिकाओ को वापस ठीक नहीं किया जा सकता क्योंकि वे दोबारा नहीं बनतीं।

जिन लोगों को भूत दिखते हैं, आत्मा/ईश्वर/जिन्न दिखता है वे सब अब कभी ठीक नहीं हो सकते। उन पर भरोसा न करें। वे कह तो सत्य रहे हैं लेकिन उन्होंने यह सब दिवास्वप्न में देखा है। जो मैं सोते समय देखता हूँ। मैं अपना स्वप्न आपको सुनाऊं तो वह lie detector में भी पास हो जायेगा।

ऐसे ही जो घोस्ट बस्टर आपको तरह तरह के उपकरण लेकर भूत ढूंढने, पॉजिटिव-निगेटिव ऊर्जा की बकवास करते दिखते हैं, वे भी पृथ्वी के गर्भ में होने वाली तरल कोर की गतिविधियों से दिमाग पर होने वाले असर और वस्तुओं के अपने आप हिलने डुलने (स्टैटिक एनर्जी) वाले क्रियाकलापों को ही मापते हैं। साथ ही यह उनका धंधा है तो मनोविज्ञान का दुरुपयोग तो करेंगे ही। अगर मुफ्त में भी करते हैं तो यह उनका सेम्पल होगा या इनको कोई धार्मिक स्थल मदद दे रहा होगा।

कभी सोचा है कि कैसे,

1. केवल धर्म विशेष के व्यक्ति पर चढ़े भूत पर धर्म विशेष के चिंन्ह का ही असर होता है?

2. मनोविज्ञानी भी पिछले जन्म के राज खोलनेवाला प्रयोग करके पिछले जन्म की यादें कैसे इसी जन्म में निकालते हैं और कैसे वह सच में इतिहास में दर्ज मिलता है?

अब इतना हमने समझाया। थोड़ा खुद भी समझो। वैसे भी यह पोस्ट बुद्धिमान/MBBS/मनोचिकित्सक/वैज्ञानिक और रिसर्च करने वालों को ही समझ में आएगी। और हाँ उनको भी जिनकी मैंने पोल खोली है। ~ रहस्यमयी ज़हरबुझा Shubhanshu का भूत।  2018/03/24 10:03 😁👊😬 2018©® VSSC

महिला सशक्तिकरण इस बार इस्लाम की दृष्टि से ~ Shubhanshu

पवित्र पुस्तक कुरान शरीफ में बार-बार अल्लाह से डरने का और उसके आदेश को मानने का ज़िक्र है। क्या अल्लाह के हुक्म के बीच में कोई और भी है? ये किताब लाने वाले कौन हैं? इनका इस पुस्तक में ज़िक्र क्यों? कहीं यह पुस्तक सिर्फ अपनी बातें मनवाने के लिये पुरुष समाज द्वारा इस्तेमाल की गई चाल तो नहीं?

प्रस्तुत कुरान के पृष्ठों में आप देख सकते हैं कि कैसे एक पुरुष महिला को

- विभिन्न परिस्थितियों में त्याग सकता है।
- किसी और की पत्नी से बदल सकता है।
- तलाक हो जाने के बाद किसी और से हलाला करवा कर (यानी पराए पुरुष से सम्भोग) पुनः विवाह कर सकता है।
- दो बार तक तलाक देकर, हलाला करवा कर अपना सकता है।
- तीसरी बार हमेशा के लिये छोड़ सकता है।
- तलाक दिए बिना 3 और विवाह कर सकता है।

लेकिन इसमें फायदा किसका है? कोर्ट ने जो तलाक गलत तरह से दिया जाता था, उसे खत्म कर दिया लेकिन 3 माह की चेतावनी वाला कुरानी तरीका जस का तस है। मतलब या तो समझौता कर ही लो या अलविदा।

मेरी महिला मित्रों। क्या आपको यह सब स्वीकार है? क्या आप आत्मनिर्भर हैं जो मर्द के छोड़ देने पर खुद अपना जीवन निर्वाह कर सकती हैं?

समाज नहीं बदलेगा। बदलना आपको ही होगा। अभी आत्मनिर्भर बनने पर ध्यान दें। फिर निकाह की तरफ ध्यान दें। केवल आप तब तक आज़ाद हैं जब तक निकाह नहीं कर लेतीं। फिर वही जुआ। लगे तो लगे नहीं तो दे पटकी, दे पटकी। बेहतर होगा कि ज़ुल्म सहने के स्थान पर "खुला" कर लें।

फैसला आपका। धर्म की गुलामी या नास्तिकता (सम्विधान) का आज़ाद और आत्मनिर्भर सम्मानित जीवन? ~ Vegan Shubhanshu Singh Chauhan®©  2018/03/20 19:19

बहादुर बनिये ~ Shubhanshu

प्रश्न: महिलाएं/किशोरियां फेसबुक/ट्विटर/इंस्टाग्राम/whatsapp पर अपनी असली तस्वीर क्यों नहीं लगाती हैं?

उत्तर: उनको इस बात का डर है कि कोई व्यक्ति उनसे रिजेक्ट होकर उनकी तस्वीर को किसी पोर्न स्टार की बॉडी पर चिपका कर उनको बदनाम कर देगा और वे विवाह नहीं कर पाएंगी।

उनको खुद पर भरोसा ही नहीं है। नहीं तो साँच पर क्या आँच? बदनाम करने वाले के लिए कानून बना हुआ है कि उसे भयानक सज़ा मिलेगी और लड़की की पहचान गुप्त रहेगी। लेकिन वो है न कि पापा/भाई/दीदी ने कह दिया तो वही करेंगे। ये वही लोग हैं जो लड़की को खुली तिजोरी कहते हैं।

महिलाओं को प्रायः नौकरी/व्यवसाय की कोई सम्भावना खुद में ही नज़र नहीं आती है (घटिया सोच), तो विवाह करके ज़िन्दगी काटने का विकल्प ज्यादा उचित प्रतीत होता ही है। जबकि पढ़ने लिखने में सबसे ज्यादा योग्य महिलाएँ ही हैं। उनको नौकरी तुरन्त मिलती है।

वह जिस व्यवसाय को शुरू कर दें, अमीर समाज उनके मोह में ज़रूरत से ज्यादा समान खरीद लेता है। इसीलिए रिसेप्शन पर सुंदर महिला को विशेष रूप से रखा जाता है। लेकिन विवाह के लालच में वह एक जगह टिक कर नहीं बैठती। इसलिये उनको वेतन मामूली ही दिया जाता है। क्या पता कब चली जाए वह अपने पिया के घर? कुछ पता नहीं।

लड़कियों को जिद्दी बनना ही होगा। वयस्क होने के बाद उन पर किसी का हक नहीं है लड़को की ही तरह।

लडको की क्षवि खराब बताने वाली महिला, विवाह उसी पुरुष से कर लेती है जिसे घरवाले फाइनल कर देते हैं। फिर यह दोहरी विचारधारा किस लिए? केवल बेवकूफी। डरपोक स्वभाव। दबाव में रहना। अरे खुद ही खुद को कमज़ोर कहने वाली महिला कभी मजबूत नहीं हो सकती।
Vegan Shubhanshu Singh Chauhan
फेसबुक ने महिलाओं की समस्या को समझा है। उसने प्रोफाइल पिक्चर गार्ड बनाया, पिक्चर का कोई स्क्रीनशॉट ले कर दुरूपयोग न करे उसके लिये add डिजाइन का फीचर भी दिया लेकिन मजाल है जो घरवालों की बात टाली जा सके?

ऐसे आप पुरुषों की बराबरी नहीं कर सकतीं। जूती ही बनी रहेंगी। विद्रोह करने से ही देश आजाद हुआ। आप भी ऐसे ही आज़ाद हो सकती हैं।

प्रश्न: महिलाएं अपनी तस्वीर में खुल कर क्यों नहीं मुस्कुराती? मतलब दांत क्यो नहीं दिखातीं?

उत्तर: वही...कहावत है न? हंसी तो फंसी। बस भैया ने बोल दिया कि दांत मत दिखाना कभी फ़ोटो में तो कर रही हैं गुलामी। और हाँ, हँस हँस के बात भी न करें लड़कों से कभी। यह भी हिदायत दी गई है।
डर किस बात का है?

वही...कहीँ लड़की को प्यार न हो जाये किसी से। बताओ हंसने तक पर पाबंदी। और ये घरवाले आपके प्रिय हैं। लड़की न हो गई ब्याही हुई गाय हो गई। कोई भी ले जा कर दूध निकाल लेगा। इसलिये बांध कर रखो। हद है यार। इंसान किसलिये बन गए फिर? गाय-भैस-सांड बन जाते न?

प्यार न हो जाये कहीं प्यार न हो जाये...फिल्मों में बसंती और वीरू के प्यार को आंसू बहा कर देखने वाले लोग अपनी लड़की को किसी अनजाने के ही बिस्तर पर भेजेंगे सीधे। लानत नाम का एक शब्द होता है उसको समझना कभी। प्यार करने वाले मर जायँगे लेकिन रुकेंगे नहीं। कर लो जितना करना है अत्याचार।

सब आपकी तरह प्रथम रात्रि बलात्कारी नहीं। कुछ पहले से प्यार भी करते हैं। ज़िस्म बाद में अपने आप करीब आता है।

प्रेम मानसिक है लेकिन हवस शारीरिक। हम हवस के पुजारी नही। इसलिये विवाह को नहीं मान्यता देंगे कभी। विवाह सिर्फ हवस (lust) की पूर्ति करने के लिये बना है। उसमें प्रेम हवस की मजबूरी बन कर होता है। सम्भोग की आदत पड़ने पर जो प्यार होता है वह हवस है वह वास्तविक प्रेम नहीं।

जब प्यार किया तो डरना क्या? न विवाह करेंगे और न ही अलग रहेंगे एक दूसरे से। प्यार करो, शक नहीं। कोई वादा करो ही मत अगर प्यार सच्चा है तो। न वादा करो न धोखा मिलेगा। ~ Vegan Shubhanshu Singh Chauhan 2018©  2018/02/22 19:05

धर्म, समाज, सँस्कृति, बलात्कार और इसका पोस्टमार्टम ~ Shubhanshu

लेखक: शुभाँशु जी

प्रत्येक सम्प्रदाय में साधारण महिलाओं को तुच्छ दर्जा दिया गया है। सभी नियम कानून केवल उनके लिये आरक्षित हैं। पुरुषों के लिये केवल कुछ नाम मात्र के। सबसे ज्यादा जो आपको बुराई हर धर्म में मिलेगी वह है बलात्कार, शोषण, छेड़खानी, बलपूर्वक वैश्यावृत्ति इत्यादि। क्या आप जानते हैं कि यह कभी खत्म क्यों नहीं होता? क्यों लोग बड़ी से बड़ी सज़ा रखने पर भी यह कार्य करने से नहीं डरते?

इस बात का राज़ खोलने से पूर्व मैं आपको आतंकवाद की अवधारणा के विषय में शहीद होने की उपाधि के बारे में बताता हूँ। आतंकवाद दरअसल बाकी मुख्यधारा के लोगों द्वारा दिया गया शब्द है। जो इसके समर्थक हैं वे इसे धर्मयुद्ध कहते हैं। धर्म युद्ध यानी धर्म+युद्ध, अर्थात एक ऐसा युद्ध जो धर्म की रक्षा के लिये किया जाता है।

धर्म क्या है? जवाब है कि सम्प्रदाय कुछ विशेष नियम कानून बनाते हैं और उनको पालन करना प्रत्येक उस समुदाय के व्यक्ति को मानना अनिवार्य कर्तव्य माना जाता है। यही कर्तव्य दूसरे शब्दों में धर्म कहा जाता है। सामान्य भाषा में सम्प्रदायों को अब धर्म शब्द से ही सम्बोधित किया जाता है क्योंकि हर सम्प्रदाय अपने नियमो को धर्म से ही सम्बोधित करता है तो बात समानार्थ हो जाती है।

अब आप जान गए हैं कि धर्म वह है जिसे पालन करने पर ही आप अपने समुदाय के हितैषी और सम्मानित बन सकते हैं।

अब आते हैं युद्ध पर। युद्ध तो पता ही होगा। हिंसा से दमन। मतलब यह है कि जो धर्म से न चले वह इस युद्ध का शिकार बनेगा। यही है धर्मयुद्ध (आम भाषा में आतंकवाद)।

अब कोई अपनी जान खतरे में डालकर युद्ध क्यों लड़े? इसके लिये एक मानसिक औजार का प्रयोग किया जाता है, जिसे कहते हैं सम्मान। अर्थात जो धर्मयुद्ध लड़ेगा, किसी भी स्तर पर; उसे बहुत सम्मानित किया जाता है। यदि मृत्यु हुई तो उसे सेना में शहीद के समान शहीद की उपाधि दी जाती है। इस शहीद की उपाधि के लालच में (जो कि माता-पिता का नाम ऊंचा करना भी कहलाती है) जो बेकार दो कौड़ी के बिना टैलेंट वाले लोग हैं वे भी पड़े रहते हैं। सोचते हैं कि यह आसान होगा।

लगभग सभी सम्प्रदाय महिलाओं को ढंकने के समर्थक हैं। आप जानेंगे कि जिन भी जगहों पर महिलाएँ छिप छिपा कर निकलती हैं या अपने किसी रिश्तेदार के साथ निकलती हैं उन्हीं स्थानों पर बलात्कार के सबसे ज्यादा केस भी देखने को मिलते हैं। अब आप सोचते होंगे कि क्या बलात्कार ज्यादा होने के कारण बदन ढंकने का नियम बना या बदन नहीं ढंका इसलिये बलात्कार हो गए?

यह उदाहरण बलात्कार के प्रमुख कारणों में से एक है। इसका उत्तर है कि यदि सँस्कृति (सम्प्रदायिक नियम) का पालन नहीं किया तो आप दुश्मन हैं। आपको सज़ा मिलेगी। क्या आप महिला हैं और आपने अपने सम्प्रदाय के अनुसार आचरण नहीं किया? यदि हाँ, तो अब आपको सज़ा दी जाएगी। जहाँ भी मौका मिले। जब मौका न मिला तो छेड़खानी और जब मिला तो चढ़ती जवानी यानी शोषण या बलात्कार।

अब बात आती है कि अगर बदन ढंका हुआ है फिर भी बलात्कार हो गया तो? अगर लड़की छोटी है तो? बूढ़ी है तो? इसके भी जवाब हैं मेरे पास।
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उपर जो आपको सँस्कृति के अनुसार आचरण न करने पर दुश्मन बताया गया है उसमें कई बिंदु हैं।

1. धर्मानुसार वस्त्र धारण करे।
2. अकेले कहीं न जाये। अंधेरा होने पर तो कदापि नहीं।
3. शिक्षा से दूर रहे।
4. पर पुरुष से दूर रहे, बात चीत पर भी प्रतिबंध।
5. दाँत न दिखाए, हंसे नहीँ। हसंते हुए किसी पुरूष से बात तो कतई न करे।
6. हंसते हुए (दांत न दिखेंं) फ़ोटो/चित्र न खिंचवाये/बनवाएं।
7. विवाहेतर सम्भोग, विवाह पूर्व सम्भोग, प्रेम आदि न किया जाए।
8. पुरुष से बातचीत फोन-इंटरनेट आदि पर भी न किया जाए।
9. जो भी इन नियमो को न माने वह बदचलन है और उसे ऐसी सज़ा दीजिये कि बाकी महिलाएं ऐसा करने से भी डरें। 
10: सज़ा के उदाहरण: 
अ. बलात्कार कीजिये तथा विरोध करे तो उसके यौनांगों को घायल कर दें और जब लगे कि पकड़े जा सकते हैं तो हत्या।
ब. ऐसी लड़की के साथ बलात्कार व हत्या पुण्य है। आपको ईश्वर कृपा मिलेगी अतः अधिक से अधिक लोग इस कार्य को करें। अर्थात गैंग रेप।
स. दूसरे सम्प्रदाय की लड़की को अकारण ही सज़ा दीजिये क्योकि वहआपके धर्म के खिलाफ पहले से ही है, साथ ही वह और नए दुश्मन पैदा करने की मशीन है। बेहतर होगा कि उसके पुत्र आपके वीर्य से उतपन्न हों। 
अब यह कैसे भी किया जा सकता है, जैसे:
अ. पहल कीजिये। प्रेम जाल में फँसाइये। तारीफ कीजिये। उससे विवाह कर लीजिये। बच्चा कीजिये और आपने उसके धर्म के कई लोग कम कर दिए समझिये।
ब. विवाह सम्भव न हो तो विवाह पूर्व बलात्कार कीजिये और वैश्यावृत्ति में धकेल दीजिये। इससे भी विपरीत धर्म के लोग कम होंगे।
स. यदि लड़की विरोध करे, पीछे पड़ जाए, विवाह की ज़िद पकड़ कर तो उसका गैंग रेप अपने मिलन के स्थान पर उसे बुला कर या अपहरण करके या धोखे से ले जाकर अपने साथियों द्वारा करवा दीजिये। पुण्य मिलेगा। वह पीछा छोड़ देगी, वह आत्महत्या कर लेगी या वैश्या बना दीजिये। काम पुण्य का ही है अतः दूसरे धर्म के लोग कम हुए।
द. Online है तो उसकी शक्ल किसी अन्य के शरीर पर लगा कर उसे प्रचारित करके बदनाम कर दो। इस से उसकी शादी नहीं होगी। शादी न होने पर वह आत्महत्या कर लेगी क्योंकि हर धर्म महिलाओं के धन कमाने पर रोक लगाता है। केवल एक ही कार्य स्वीकृत है और वह है वैश्यावृत्ति। अर्थात वह या तो यह बन जाये या मर जाये। ऐसी हालत कर दो तो तुमने धर्म युद्ध का महिलाओं वाला पक्ष जीत लिया। आप सम्मान के हकदार हैं। आपको निजी रूप से सम्मानित किया जाएगा।
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यह उक्त "धर्मयुद्ध सम्विधान" का वह सीक्रेट सोसाइटी हिस्सा है जो आपको बता कर मैं खतरा मोल ले रहा हूँ। यह कागजों पर नहीं है। यह मौखिक हैं। पहली बार लिपिबद्ध किया गया। आप इसे सत्य महसूस करेंगें। यह आप भी जाने-अनजाने जानते हैं।

अब आपने देखा कि मूल मकसद महिला का नाश करना ही है यदि वह आपके धर्म/सँस्कृति के अनुसार नहीं चलती।

क्या सुबूत है कि यह सत्य है? यह सत्य है क्योकि मैने उक्त वार्तालाप पत्रकारों की लेटनाइट दारू-मुर्गे की पार्टियों में सुने हैं जिनमें हर धर्म के स्त्रीपुरुषों को यह छेड़खानी/बलात्कार समाज सेवा लगते हैं। मैं 10 वर्ष तक पत्रकार की नौकरी कर चुका हूं और अब स्वतन्त्र पत्रकार हूँ।

क्या अब भी आपको लगता है कि बलात्कार कानूनी सज़ा बढ़ाने से रुक सकते हैं? यदि हाँ तो आप मूर्ख हैं।

इसके वास्तविक इलाज हैं:
1. धर्म/सम्प्रदाय से मुक्ति। साथ ही आत्मरक्षा का पूरा इन्तज़ाम।
2. मार्शल आर्ट के tiquandow ब्लैकबेल्ट den 4 तक की पूर्ण शिक्षा।
3. आधुनिकता का प्रदर्शन (मन मर्जी के कपड़े पहनें) ताकि धर्मयोद्धा को लगे कि आपको उससे कोई डर नहीं है।
4. पोलिस बेंटन, काली मिर्च स्प्रे, करंट मारने वाली मशीन खरीदें। न मिलने पर मुझे बता सकते हैं।
5. छोटे बच्चों को अकेला न छोड़ें। जब तक वे आत्मरक्षा करने के लिये तैयार नहीं हो जाते।
6. सबक सिखाएं। कानून की हद में रहते हुए गलत हरकत करने वाले को उसी तरह सबक सिखाएं जैसा वह आपके बारे में सोचता है। इतना डर पैदा कर दें कि कोई बिना पूछे touch भी न कर सके।

मेरी दोस्तों को झेलना पड़ा है, उनके किस्से सुन कर आंखों में आंसू आते हैं। साथ ही आता है गुस्सा, ऐसे धार्मिक सांस्कृतिक समाज पर जो इतना घ्रणित और दोगला है। अच्छा है कि मैं धर्ममुक्त हूँ इसलिये आपको यह सत्य बता भी पाया।

आप भी बनिये। इस सत्य को हर बालिका तक पहुँचा दो। आपको पुण्य तो नहीं मिलेगा लेकिन तेजी से कम हो रही सैकड़ों महिलाओं को बचाने की आत्मशांति ज़रूर मिलेगी। मेरी तरह। ~ आपका अपना मित्र, शुभाँशु जी, 2018© लेखक: शुभाँशु जी

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