यह आसानी से समझा जा सकता है कि क्यों लोग (प्रेमी जोड़े या पति-पत्नी) एक दूसरे को कुछ समय बाद छोड़ देते हैं!
क्योकि इंसान मौलिक रूप से बहु-आकर्षण क्षमता वाला (polyandrous/polygamous leaning) जीव होता है, वैसे अधिकांश स्तनधारी जीव ऐसे ही होते हैं तो कुछ नया नहीं है। विवाह का अर्थ सेक्स होता है विज्ञान में और लोगों की राय में भी, तो इस प्रवृत्ति को समझने के लिए मानव के वास्तविक उद्विकास (evolution) को देखना होगा।
दुनिया मे सबसे सम्भोग नहीं किया जा सकता लेकिन जितनों से भी कर लिया जाए, ये मानव का मूलभूत प्रयास रहता है। क्योंकि न तो हर एक सम्भोग में बच्चे हो सकते हैं और न ही हर जन्तु प्रजनन क्रिया करने में सफल ही हो पाता है।
मानवों में तो यह इसलिए भी बेमौसम होता है क्योंकि एक महिला सीमित अंडे पैदा करने की क्षमता लेकर दुनिया में आती है और माह में केवल कुछ दिन ही प्रजनन योग्य स्थिति में होती है, जो सामान्यतः 28 दिन के चक्र में 14वें दिन के आसपास का समय होता है। बच्चे होने की सम्भावित अवधि अंडोत्सर्ग (ovulation) से कुछ दिन पहले और कुछ दिन बाद तक की होती है (जिसे फर्टाइल विंडो कहते हैं)। अंडोत्सर्ग वाले दिन गर्भधारण की सम्भावना अत्यधिक प्रबल होती है और जैविक रूप से महिला इसी समय सम्भोग के प्रति वास्तविक रूप से लालायित होती है। उसकी योनी में श्लेष्मा का स्राव अधिक होने से सम्भोग की इच्छा अपने आप जागृत हो जाती है। इस अवधि में यदि वीर्य योनी से गर्भाशय में पहुचता है तो निषेचन की प्रक्रिया होगी अन्यथा यह अंडा नष्ट हो जाएगा। इसी प्रक्रिया के चक्र को माहवारी कह कर सम्बोधित करते हैं।
अब सवाल उठता है कि कैसे पता चले कि अन्डोत्सर्ग वाला दिन कौन सा है? आधुनिक सभ्यता में यह आसानी से पता नहीं लगाया जा सकता क्योंकि समाज ने माहवारी को गंदा-घिनौना बता कर पूरी तरह छिपा दिया है। प्राचीन या आदिम समाजों में माहवारी का चक्र पूरी तरह दृश्य (visible) होता था, जिससे दिनों की गिनती करके अंडोत्सर्ग के समय का अनुमान लगाया जा सकता था। लेकिन अब सैनिटरी उत्पादों और सामाजिक वर्जनाओं के माध्यम से इस पूरे चक्र को 'अदृश्य' कर दिया गया है।
इससे दाग न लग जाए, इसलिए लोग आज भी गंदा कपड़ा इस्तेमाल करना उचित समझते हैं। सेनेटरी पैड महंगा जो है। अरे हाँ 2 रूपये वाला भी आ गया है। लेकिन सिर्फ फिल्म में। अब आ गया है पारंपरिक विज्ञापनों से बढ़ कर चमत्कारी मेंस्ट्रुअल कप का दौर। 150 रुपए से लेकर 2000 रुपए तक की प्रारम्भिक खर्च के बाद 5 से 10 वर्ष तक माहवारी और कपड़े, सेनेटरी पैड से छुट्टी मिल जाती है।
चूंकि आधुनिक समाज में इस चक्र के सारे संकेत पूरी तरह छिपे हुए हैं, इसलिए पुरुष निश्चित तौर पर नहीं जानता कि प्रजनन का सटीक दिवस कब है। परिणामस्वरूप, पुरुष के भीतर हर समय सम्भोग की इच्छा जागृत रहती है ताकि कोई भी अवसर चूके नहीं।
ये मानव दिमाग मे भरा हुआ है (coded in gene) कि ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा किये जायें ताकि मानव जाति या कोई भी जाति (अन्य जीवों के मामले में) बची रहे। इस प्रावस्था को natalism कहते हैं।
प्रकृति में ये ऐसा इसलिये था क्योंकि जब विवाह नहीं था और विज्ञान नहीं था तो सभी मानव बहुत कम समय तक जी पाते थे (अन्य जंतुओं की तरह)।
ऐसे में सिर्फ वही प्रजाति जीवित बची रह सकी जो ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने में सफल हुई। उद्विकास (evolution) के दौरान केवल वही मानव जीवित बचे जो सम्भोग करने में और अधिक बच्चे पैदा करने में ज्यादा सफल हुए।
इन मानवों में सम्भोग के प्रति बहुत तीव्र इच्छा थी और इसी कारण ये यहाँ तक पहुच सके। यही तीव्र इच्छा आज के मेडिकल साइंस के आ जाने के कारण जनसँख्या बढ़ाने की ज़िम्मेदार कहलाई क्योकि अब लोग चिकित्सा विज्ञान के कारण कम मरते हैं।
लेकिन इंसान की प्रवृत्ति (instinct) नहीं बदली। वह वैसी ही रह गई।
लोगों ने इस प्रवृत्ति को बदलने के लिये monogamy (एकल विवाह) को अनिवार्य बनाया ताकि समाज मे धन का विनिमय करने के लिये मजदूर मिल सकें और प्रति व्यक्ति परिवार के होने के कारण बच्चों का पालनपोषण सुनिश्चित हो सके। इस प्रकार जनसँख्या तीव्र गति से बढ़ने लगी। समाज की अर्थव्यवस्था को चलाने के लिये मोनोगैमी काम आई और एक व्यक्ति से विवाह बहुत प्रसिद्ध हुआ।
लेकिन इसके दुष्परिणाम भी समय के साथ सामने आने लगे। एक समाज एक निश्चित स्थान पर स्थित परिवार के समान होता है। प्रायः समाज एक शहर, राज्य या एक देश तक सीमित होता है। संगठित रूप में यह एक समुदाय के रूप में होता है। इसकी एक निश्चित सीमा होती है, निश्चित संसाधन (resources) होते हैं और उनकी जीवटता उन्हीं पर निर्भर होती है। अर्थात यदि संसाधनों में कमी आयी तो समाज में समस्याएं आनी तय हैं।
उदाहरण 1: एक छोटे शहर में 50 घर हैं। वे लोग वर्तमान परिस्थितियों में 60 घरो का खर्च उठा सकें इतना ही कमाते हैं। यानी अभी इसमें 10 और घर बसाए जा सकते हैं। लेकिन जगह की कमी है। इसलिये वह संख्या 50 से आगे कभी नहीं बढ़ सकती। यह 10 घरों की अतिरिक्त राशि सभी परिवार आंशिक रूप से अपने भविष्य की विकट परिस्थितियों (आपातकाल) के लिये सुरक्षित रखते हैं।
लेकिन जनसँख्या समानुपातिक ढंग से बढ़ रही है। कारण है नेटालिस्टिक भावना और संस्कृति द्वारा इसके सन्दर्भ में बनाये गये विवाह और शीघ्र बच्चों को पैदा करने जैसे अनिवार्य व्यवहार/परम्पराएं।
नतीजा साफ है। अतिरिक्त लोग संसाधनों की कमी के कारण सड़कों पर भिखारी, बेकार और बेरोजगार बनकर जीवन गुजारने लगे हैं। इससे उन 50 घरों को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, उनका जमा धन इस असंतुलन को कुछ समय तक संभालता है, लेकिन धीरे-धीरे यह स्थिति व्यवस्था में विकृतियों को जन्म देती है。
उदाहरण 2: उपर्युक्त उदाहरण में एक नियमित समन्वय दिखाया गया है जब परिस्थिति नियंत्रण में है। अब आती है अनियंत्रित परिस्थिति (वर्तमान)। वर्तमान समय में चिकित्सा विज्ञान उत्तरोत्तर प्रगति कर चुका हैं। असाध्य रोग और समस्याएं सुलझाई जा रही हैं। जनसंख्या नियंत्रण खतरे में है। इंसान की औसत आयु बहुत बढ़ गई है जो भविष्य में और ऊपर जा सकती है।
अब क्या होगा? सीमित जगह, सीमित संसाधन, सीमित स्थान लेकिन अधिक आबादी।
- बच्चे: मम्मी-पापा का कमरा खाली हो जाता तो उनके पोते-पोतियों को दूसरे शहर में ऋण लेकर नया घर न लेना पड़ता।
- पोते-पोती: ये बुजुर्ग मरते क्यों नही? सम्पत्ति की ज़रूरत है और ये कुंडली मारे बैठे हैं।
- बैंक: 100 साल तक ही पेंशन मिलेगी। उसके बाद भी जिंदा रहे तो कुछ और जुगाड़ ढूंढना होगा।
जब लोग ज्यादा और संसाधन कम होंगे तो क्या होगा? सब एक दूसरे का मुहँ ताकना शुरू।
अब क्या करें? फिर से मौत पीछे? फिर क्या फायदा जीकर जब जीने को साधन नहीं। फिर से आदिमकाल शुरू। फिर से संघर्ष? फिर से एक दूसरे से छीनने का दौर शुरू। हिंसात्मक दृश्य। सब लड़-भिड़ के पुनः समाप्ति की ओर। यह क्या? तो क्या करें? बच्चे न पैदा करें? नेटालिस्टिक प्रवृत्ति का लोप कर दें? तब anti-natalist समाज समाप्ति की ओर नहीं बढ़ जाएगा? मानव जाति समाप्त नहीं हो जाएगी?
चलिये देखते हैं। अभी बात हुई थी कि पोलिगेमस मानव को सदियों से मोनोगेमस बनाये जाने का प्रयास किया गया। लेकिन फिर भी इसका उल्लंघन हुआ। वैश्विक स्तर पर जब पितृत्व परीक्षणों (paternity tests) के सांख्यिकीय डेटा को देखा जाता है, तो कई ऐसे मामले सामने आते हैं जहाँ सामाजिक पिता और जैविक पिता अलग निकलते हैं, जिससे पारंपरिक रूप से शुद्ध वंश चलाने के दावों पर गहरा प्रश्नचिह्न लग जाता है।
वास्तव में वंश चलाने के आनुवंशिक (genetic) मायने बिल्कुल अलग हैं। विज्ञान के नियम के अनुसार, यदि माता-पिता एक ही करीबी रक्त सम्बन्धी होंगे, तो 'इनब्रीडिंग डिप्रेशन' के कारण वंश शुद्ध नहीं बल्कि कमजोर और गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाएगा। और यदि माता-पिता अलग परिवारों से हैं, तो संतान में गुणसूत्रों का आधा हिस्सा (46 में से 23) माता के वंश का and आधा पिता के वंश का आता है। यानी शुद्ध रूप से केवल एक ही लीनियज का प्रवाह व्यावहारिक तौर पर एक सामाजिक कल्पना मात्र है।
तो क्या सीखा? मतलब प्रवृत्ति पर पूरी तरह रोक लगाना असम्भव। इसलिये मोनोगैमी की तरह एन्टी नेटालिस्ट सोच लाइये। जनसँख्या को स्वेच्छा से रोकिये। गर्भनिरोधकों का जम कर उपयोग करें। सरकार का सहयोग लें। कंडोम, नसबंदी, मैथुन भंग, डायफ्राम, आईयूडी (आधुनिक और सुरक्षित 3 से 5 वर्ष तक), copper T, फीमेल कंडोम, आपातकालीन गर्भनिरोधक गोलियां, सहेली, डिम्पा इंजेक्शन इत्यादि का विकल्प चुनें। अनजान साथी से सम्भोग करते समय कंडोम प्रयोग करें या उसकी STD/HIV जांच अवश्य करवा लें।
कुछ लोग इस बात को कभी नहीं मानेंगे और जो विवाह को त्यागेंगे वे live-in-relationship में बच्चे पैदा करेंगे ही और जनसँख्या संतुलित हो जाएगी।
अब बात आती है कि यदि इंसान असल में बहु-आकर्षण क्षमता वाला है, तो यह प्यार किस चिड़िया का नाम है? क्यों वह एक के साथ चिपक जाता है?
इसका मुख्य कारण यह है कि इंसान खाली नहीं बैठ सकता। इसलिये उसे कोई न कोई काम चाहिए। कुछ नहीं तो मनोरंजन या गप शप करने के लिये ही सही, एक साथी। ये बात सिर्फ इंसान के लिये ही सही नहीं है। लगभग सभी जीव-जंतु ऐसा ही करते हैं। उनको भी कोई न कोई चाहिए ताकि अपना फालतू समय काट सकें। जिनको यह साथी नहीं मिल पाता वे या तो निर्जीव वस्तुओं से मनोरंजन करते हैं। जैसे खेल इत्यादि या वे सोते रहते हैं।
इस प्रकार जो आनन्द प्राप्त होता है, उससे सभी के मस्तिष्क से डोपामिन, सेरोटोनिन, ऑक्सीटोसिन तथा एंडोर्फिन्स हार्मोन निकलता है जो एडिक्टिव (जिसकी लत लग जाती है) होता है। इनके अतिरिक्त विशेष प्रकार के शरीर से जोड़ रखने वाले फेरोमोन भी होते हैं जो मानव की পसीने की ग्रन्थियों से स्रावित होते हैं। यह ऐसे गुण रखते हैं जो केवल नाक के विशेष ग्राहियों (receptors) को ही महसूस होते हैं। जिनको आप पहचान नहीं सकते अर्थात गन्धहीन होते हैं। यह सीधे कामोत्तेजना पैदा कर सकते हैं। इसी के कारण पहली ही मुलाकात में तीव्र आकर्षण पैदा होता है। भाई-बहन-माता-पिता-पुत्री-पुत्र के फेरोमोन समान होने के कारण उनमें इनका प्रभाव हल्का होता है। लेकिन साफसफाई से रहने के कारण यह फेरोमोन अब निष्प्रभावी हो गए। विपरीत फेरोमोन एक दूसरे को आकर्षित and समान प्रतिकर्षित करते हैं।
प्राचीन काल में पसीने की गंध सेक्स का turn on होती थी। लेकिन आज डिओडरेंट ने इसको एक बुराई में बदल दिया है। अब बैक्टीरिया जनित मल की गंध को साफ करने के चक्कर में असली फेरोमोन भी ख़त्म रहे हैं।
इसी लत को प्यार/love/मोहब्बत/इश्क/प्रेम कहते हैं। ये किसी भी चीज से हो सकता है। जिससे भी आनन्द की प्राप्ति हो। परंतु संभोग की इच्छा ऑक्सीटोसिन and डोपामिन का मिला जुला प्रभाव होती है जिसमें ऑक्सीटोसिन love को बढाने वाला addictive हार्मोन कहा जाता है। इसके प्रभाव से यौनांगों का विकास शीघ्र हो जाता है। यह माता में दुग्ध उत्पादन में भी सहयोग करता है।
आवश्यकतानुसार इसमें भेद भी उत्पन्न हुए और जब मानव समाज रिश्ते बना रहा था तो उसने प्रेम को तरह-तरह के भेदों में बांट लिया।
माता-पिता का प्यार, भाई-बहन का प्यार, रिश्तेदारों का प्यार, दोस्तों का प्यार, शिक्षक and विद्यार्थियों का प्यार और सबसे महत्वपूर्ण, रोमांस वाला प्यार, आकर्षण का सुख, कामोत्तेजना का आनन्द, संभोग का आनंद।
सम्भोग का आनंद एक ऐसा आनंद है जिसके कारण प्रजनन की भावना जीवित है। यह सभ्यता के साथ-साथ मनोरंजन में बदल गया। इसी के चलते बहु-आकर्षण का स्वभाव फलाफूला। इसे आम भाषा में हवस (lust) कहते हैं। यह डोपामिन and ऑक्सीटोसिन का मिला जुला प्रभाव हैं। यह एक सम्पन्न समाज में एक व्यवस्था यानी वैश्यावृत्ति and पोर्न बन कर उभरा। बहु-आकर्षण प्रवृत्ति वाले पुरुषों ने सत्ता में आकर नगर वधु का चलन शुरू किया। नाम से ही स्पष्ट है कि सारे नगर की पत्नी। यह व्यवस्था समय के साथ पूरे तंत्र में फैल गई। कारण वही, एक बार से दिल नहीं भरता। आखिर क्यों एक साथी से दिल नहीं भरता?
कुछ लोगों ने इन अंतर्विरोधों के चक्कर में अपने प्राथमिक संबंधों की ईमानदारी को दांव पर लगा दिया।
प्रश्न: इन वैश्याओं के बच्चों का क्या होता है? उत्तर: इतिहास and समाज के काले पन्नों में शोषण and कत्ल की कई डरावनी कहानियां आज भी दर्ज हैं।
ऐसा पाया गया है कि एक ही साथी से सम्भोग करते-करते कई बार कामोत्तेजना का वह शुरुआती स्तर समाप्त हो जाता है and बोरियत होने लगती है। दवाओं के अत्यधिक and अनियंत्रित प्रयोग के अपने गंभीर शारीरिक दुष्परिणाम हैं।
नया साथी देखते ही या सिर्फ जगह/स्थान/रोल बदलने से भी कुछ समय तक ये बंद कलियाँ खिलने लगती हैं। यह पूरी तरह से न्यूरोकेमिकल बदलावों and डोपामिन रीसेट का खेल है।
प्रारम्भ में केवल विपरीत लिंग के लोगों में ही रोमांस सम्भव माना जाता था परंतु कालांतर में इसके अन्य भेद भी सामने आए। जैसे LGBTQ (Lesbian, Gay, Bisexual, Transgender, Queer)।
इन सभी रोमांटिक प्रेमों के खिलाफ धर्म and कानूनों ने व्यापक मुहिम छेड़ दी। इतिहास में अनगिनत जोड़ों को प्रताड़ित किया गया या मार डाला गया, उनके ही अपने घरवालों के द्वारा, या जो जोड़े नहीं मार पाए गए, उनको बाकायदा पापी घोषित करके कत्ल कर दिया गया।
क्यों? बहुत कड़वा जवाब है इस क्यों का।
तो चलो कुछ सवालों का जवाब ढूंढते हैं पहले: विवाह जो समर्थन प्राप्त संस्था है, उसकी सामान्य विधि क्या है?
- अपनी ही जाति and स्टेटस वाले, सुदंर चेहरे वाले या उनसे ऊपर के खानदान से बात चलाई जाती है।
- यदि बात नहीं बनती तो कम से कम में जो भी मानक पूरे करता हो उसके साथ रिश्ता पक्का किया जाता है।
- धन का लेनदेन शुरू।
- विवाह के उम्मीदवारों से या तो कुछ नहीं पूछा जाता है या फ़ोटो दिखा कर या आमने-सामने बिठा कर परिचय करवा देते हैं। ज्यादा सम्पन्न हैं तो आपस में फोन पर बातचीत भी होती है।
- फिर उचित समय निर्धारित करके, विवाह समारोह आयोजित किया जाता है जिसमे ज्यादा से ज्यादा लोगों को, अपना स्टेटस दिखाने and जान पहचान बढ़ाने के लिये, तथा नेग/उपहार रूपी धन की वापसी की उम्मीद में, बुलाया जाता है।
इनकी आव-भगत की जाती है, वर पक्ष and वधू पक्ष के तमाम लोग इस तमाशे में शामिल होते हैं। भारी धन हानि होती है। महंगे परिधानों में लोग आकर गरिष्ठ and महंगा भोजन करते हैं and भरी हुई प्लेट कूड़े के ढेर में फेंक देते हैं।
- इस सब के बाद या पहले (परम्परानुसार) विवाह की रस्म होती है। जिसमे कोई धार्मिक पुजारी/काजी/मुल्ला/पादरी आकर वर and वधु को सैकडों लोगों की मौजूदगी में जीवन भर साथ रहने की शपथ दिलवाता है and परलौकिक डर दिखाता है कि यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया तो बुरा होगा। सभी लोग इस agreement के गवाह बनते हैं and इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी करा ली जाती है।
- सम्भोग रात्रि (सुहाग रात): दो अनजान लोग सीधे शारीरिक स्तर पर जुड़ते हैं। समाज बिना पर्याप्त फोरप्ले and मानसिक तैयारी के इस प्रथम शारीरिक संबंध को मौन सहमति मान लेता है।
बिना उचित मानसिक and शारीरिक तत्परता के यह प्रक्रिया अक्सर दमन and असंतोष को जन्म देती है। पारंपरिक सोच में फोरप्ले की महत्ता को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है, जिससे वैवाहिक जीवन की शुरुआत ही गलत बुनियाद पर होती है। कानून भी इसी सामाजिक सोच से प्रभावित रहता है, यही कारण है कि वैवाहिक बलात्कार (marital rape) जैसे गंभीर मुद्दों पर कानूनी पेंच फंसे रहते हैं。
इतनी बड़ी परियोजना केवल 2 लोगों के बच्चे पैदा करने के लिये नहीं है, बहुत बड़ी सामाजिक संरचना है इसके पीछे।
ये सब इसलिये ताकि कोई भी अपनी मर्जी से विवाह न कर ले। एक विवाह एक व्यापारी के लिए विज्ञापन, एक कारपोरेट के लिये नए व्यापार के लिये रास्ते खोलने वाला and बड़े लोगो से सम्पर्क बनाना हो सकता है।
धर्म को क्या फायदा है? जितने ज्यादा कमाने वाले होंगे उतना ज्यादा दान। उतने ज्यादा नामकरण, यग्योपवीत संस्कार, मुंडन, इत्यादि 16 संस्कारों में धन कमाने का अवसर। And फिर खानदानी लॉयल्टी।
अब अगर उन माता-पिता के बच्चे खुद ही अपना जीवन साथी चुन लेंगे तो उनके इस प्लान का क्या होगा?
भारत के परिपेक्ष्य में:
वधू पक्ष: एक तो लड़की को घर से विदा कर दिया जबरन and फिर रोने का नाटक भी। ज़िन्दगी भर अपमान करवाने and ससुराल वालों के नखरे and फरमाइशों को पूरा करने का वादा भी कर लिया। दान देने वाला बाप छोटा and लेने वाला बड़ा।
वर पक्ष: एक तो लड़की ले आये दूसरे की खा पी कर, साथ में पैसा भी ले आये, फिर भी दहेज चाहिए? नहीं दें तो परिणति प्रताड़ना, दुर्घटना या आत्महत्या के रूप में सामने आती है।
यदि दहेज की मांग पूरी करते रहे तो वधू पक्ष गरीबी में जीवन जीता है and अपनी ही संतान या किस्मत को कोसता है।
उधर वर-वधु का जीवन:
पति: 1. तू लाई ही क्या थी? ये दो कौड़ी का सामान? 2. तेरे बाप ने तुझे यही सिखा पढ़ा के भेजा है कि तू हमसे जुबान लड़ाती है? 3. अब तेरे में वो पहले वाली बात नहीं रही, अब तेरे साथ मज़ा नहीं आता Lights? 4. आफिस में अपनी जूनियर के साथ नया आकर्षण ढूंढना। 5. घरवाली and बाहरवाली दोनों को रखने की चाहत।
सास: 1. अरे करमजली, फिर दूध जला दिया, यही सिखा कर भेजा है तेरी माँ ने? 2. नाश्ता टाइम पर चाहिए, अभी तेरे बाप को बुलाती हूँ ठहर जा। 3. पोछे का पानी अब तक नहीं सूखा? मार डालने का प्लान है। 4. लड़का कब देगी तू?
ससुर: 1. बहू, ज़रा मेरा भी थोड़ा ध्यान रख लिया कर, मेरे कपड़े, सामान वगेरह का ध्यान तुमको ही रखना है अब।
बहू: 1. एक आदमी से शादी की थी, ये तो पूरा कुटुंब ही पल्ले पड़ गया। क्या क्या कर लूँ अकेले? 2. इज़्ज़त तो कोई है नहीं, नौकर बन कर जीना पड़ रहा है। 3. संतान के लिंग निर्धारण में मेरा क्या वश? 4. मैं कहाँ फंस गई? 5. साथी की शारीरिक अक्षमता या कम समय टिकने के कारण अतृप्ति। 6. कुटुंब के अन्य पुरुषों की गलत नजर। 7. सामाजिक बंधनों के कारण चुप रहकर घुटते जाना।
ऑफिस की जूनियर: शोषण की स्थिति में समाज कामकाजी महिलाओं को ही संदेहास्पद नजर से देखता है। व्यवस्था ऐसी है कि विरोध करने पर नौकरी या तरक्की दांव पर लग जाती है, इसलिए अक्सर मौन रहकर समझौता करना ही अंतिम विकल्प मान लिया जाता है।
परिणाम: विवाह सफल! बधाई हो। लड़का हुआ है।
गुलामी स्वीकार कर लो तो कोई दिक्कत नहीं है। लड़की समाज के पांव की जूती ही तो है। लड़की का तो नाम ही समर्पण है। बोले तो आत्मसमर्पण (surrender)।
विरोध किया तो समस्या शुरू। समाज कहता है कि विरोध मत करो। तो मत करिए, जो चलता है चलने दिया जाए।
इस सब का विरोध शुरू से क्यों नहीं हुआ? क्योकि इसको चलाने में धर्म का बहुत बड़ा हाथ था जिसके डर से लोगों ने विरोध नहीं किया।
"लड़की की अब लाश ही वापस आएगी।" "पति का घर ही अब उसका घर है।"
इसी तरह लोग अपनी वास्तविक प्रवृत्ति को छुपा कर जीने लगे, अपने बहु-आकर्षण स्वभाव को दबाए रहे, लेकिन समय बदला and इसके बुरे परिणाम सामने आने लगे, क्योकि इंसान अपनी बुनियादी सहज प्रवृत्तियों (instincts) को पूरी तरह ख़त्म नहीं कर सकता। इसी दमनकारी, स्वामित्ववादी and यौन रूप से पाखंडी सामाजिक ढांचे के कारण गुप्त संबंध, चीटिंग, मानसिक हिंसा and यौन कुंठाएं समाज में फैलती गईं।
विवाहेतर सम्बन्ध and घरेलू हिंसा सब अवैध कहलाने के डर से चुप चाप होने लगीं। समाज के ठेकेदारों ने कड़े नियम and सजाएं बनाईं, लेकिन पाखंडी ढांचे में कोई बुनियादी सुधार नहीं हुआ।
आज भी यही हो रहा है। वैवाहिक जीवन में अक्सर यौन इच्छाएं एकतरफा थोपी जाती हैं, जहाँ आपसी सहमति या महिला की अपनी कामुकता की अभिव्यक्ति को ही वर्जित या गलत मान लिया जाता है। जो लोग खुले तौर पर व्यवस्था का विरोध नहीं कर पाते, वे छिपकर शॉर्ट-टर्म संबंध (gf-bf) बनाने लगते हैं। वहाँ भी कई बार भावनात्मक ब्लैकमेल या सहमति की सीमाओं का उल्लंघन देखा जाता है। And समाज का सबसे आसान तरीका देखिए—ऐसी किसी भी असहज स्थिति या विवाद से बचने के लिए लड़की से समझौता करके शादी करवा दी जाती है, भले ही बाद में तलाक की नौबत आ जाए या घरेलू हिंसा का दौर शुरू हो।
शारीरिक आकर्षण and वास्तविक मानसिक प्रेम को जबरन मिलाकर एक ही पैकेज बनाने से ही क्लेश and अपराध होते हैं। यौन विशिष्टता (sexual exclusivity) हमेशा वास्तविक निष्ठा की गारंटी नहीं होती, लेकिन मानसिक and भावनात्मक ईमानदारी (transparency) जरूर होती है।
लिव इन रिलेशनशिप दो लोगों का व्यक्तिगत सम्बन्ध है जहाँ किसी बाहरी तंत्र का दखल नहीं होता। यह उन लोगों के लिए एक विकल्प है जो संतान चाहते हैं।
जिनके बच्चे नहीं and अलग/व्यस्त रहते हैं, तो वे अपने बुजुर्गों की देखभाल के लिये पेशेवर and प्रमाणित सहायता (caregivers) की व्यवस्था कर लें, and समाज hospitality and परिवार को भी इस आधुनिक बदलाव को स्वीकारना होगा।
जो Antinatalist Vegans हैं, वे पूरी सहमति, सुरक्षा and पारदर्शिता पर आधारित आधुनिक संबंधों (transparent and safe concepts) को समझें, and सुरक्षित यौन जीवन तथा प्रेम को जिम्मेदारी से प्रबंधित करें। इंसान की स्वभावगत विविधताओं के कारण कोई भी व्यवस्था सब पर जबरन लागू नहीं की जा सकती। यदि यह विनाशकारी प्रजाति स्वेच्छा से प्रजनन रोककर धीरे-धीरे समाप्त होती है, तो यह किसी परमाणु युद्ध या हिंसक विनाश से कहीं बेहतर अंत होगा।
अस्वीकरण: यह व्यक्तिगत सोच है, किसी को बाध्य नहीं किया गया है। वही करें जो दिल कहे। धन्यवाद।
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