Zahar Bujha Satya

Zahar Bujha Satya
If you have Steel Ears, You are Welcome!

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शनिवार, अप्रैल 18, 2020

Nonviolence first then self-defense




एक बार स्कूल में गुस्सा हो गया था। एक लड़के को 4 टांके आये। फिर उसने माफी मांगी तो माफ कर दिया।

फिर कॉलेज में गुस्सा हो गया था तो 10 लड़कों ने मुझे पकड़ कर उस लड़के को मुझसे बचाया। कह रहे थे, "भाई, वो कमज़ोर है, मर जायेगा।" तब उसने माफी मांगी तो माफ कर दिया।

एक लड़के ने मुझे दोस्ती का धोखा देकर एक लड़की के मन में मेरे बारे में झूठ भरा। उसे जाने दिया। फिर दूसरे कॉलेज गया उधर भी एक लड़के ने मेरे बारे में गलत बातें फैलाई, उसे सिर्फ डरा के छोड़ दिया क्योंकि वो भी दोस्ती का नाटक करके धोखा दे चुका था।

फिर डिप्लोमा की क्लास में सब लड़के दुश्मन बन गए, क्योंकि लड़कियों को मैं पसन्द था। उधर भी लड़ाई टाली।

अब फेसबुक है, सोच रहा कि इधर शब्दों से क्या लड़ना? कभी-कभी कुछ बोल देता हूँ, गुस्सा आने पर, लेकिन लिमिट में।

शायद इसीलिए लोगों से रैंडम नहीं मिलता। केवल अच्छे भले लोगों से ही मिलना सम्भव होगा भविष्य में। अनजान लोगों से मिलना खतरनाक है।

क्या पता कोई कुछ गलत कर दे? या तो मैं मारा जाउँ या फिर अगले का सारा वजूद मिट जाए या मुझसे कुछ न हो सके और मैं ही पिट कर वापस आ जाऊं। कुछ कह नहीं सकते। अब तो यही सीखा है कि अगर लड़ना आवश्यक न हो तो झगड़े से दूर रहो। एक भी रास्ता अगर हिंसा के बिना निकलता है तो निकाल लो। गुस्सा आये तो अगले से दूर हो जाओ। वो जगह छोड़ दो।

कोई तुम्हारी जगह पर ऐसा करे तो उसे बाहर कर दो या बाहर जाने को कहो। सम्पर्क काट दो, सारे उससे। बस ज़िन्दगी सुकून से जी लो। बस यही मेरी इच्छा है। ~ Shubhanshu Dharmamukt 2020©

शुक्रवार, अप्रैल 17, 2020

A Communist Filed RTI




सरकार: RTI act के तहत आप ज़रूरी जानकारी ले सकते हैं जो जनता को जानने का हक संविधान देता है।

लोकतंत्र विरोधी शंकालु द्वारा RTI में पूछे गए प्रश्न:

1. कोरोना के इलाज में कितनी लड़कियाँ डॉक्टर या नर्स हैं?
2. उनके स्तनों व योनि के फ़ोटो दिखाइए।
3. उनका फोन नंबर, नाम पता, और बॉयफ्रेंड (अगर है) का बॉयोडाटा भी दीजिये।
4. उनको क्या पसन्द है? खाने, घूमने-फिरने व कौन से सेक्स पोजीशन और सेक्स ड्यूरेशन पसन्द है?

सरकार का जवाब: क्षमा कीजिये इस तरह के प्रश्नों के उत्तर नही दिए जा सकते और कृपया ऐसा दोबारा न करें अन्यथा आपके खिलाफ आम लोगों की निजी जानकारी में दखल देने के जुर्म में कार्यवाही होगी।

(कहने का अर्थ शंकालु ने समझा, 'चल हट झोपड़ी के, दोबारा दिखा तो फाड़ देंगे')

अगले दिन सोशल मीडिया पर शंकालु: 😭 सरकार से कोरोना मरीजों पर RTI करी थी, मुझे गाली लिख कर भेजी सरकार ने। सरकार तानाशाही हैं। RTI काम नहीं करता। साम्यवाद लाओ, देश बचाओ। ✊

शुभ: ज़रा RTI की रसीद, जवाब और प्रश्न दिखाना।

शंकालु: आ गया सरकार का दल्ला। नहीं दिखाता जा।

शुभ: जब आप खुद सुबूत के बिना अफवाह फैला सकते हैं तो सरकार जो भी कर रही है हम उसके साथ हैं। आप कोई प्रमाण न देकर खुद ही खुद को गलत साबित कर रहे हैं।

शंकालु का मित्र: शुभ, इनबॉक्स में आओ। इसकी पोल खोलता हूँ। 🤣 ~ Shubhanshu Dharmamukt 2020©

मंगलवार, अप्रैल 14, 2020

Vegetarians are more bad than Omnivores ~ Vegans




दुनिया के लिए, शाकाहारी (vegetarian), सर्वाहारी (omnivores) से ज़्यादा ख़तरनाक हैं। सर्वाहारी को आप समझा सकते हो कि वह गलत है लेकिन शाकाहारी डेयरी/शहद का सेवन करके भी, खुद को निरवैद्य (Vegan) समझता फिरता है। जिसे समझाना बहुत कठिन है।

डेयरी में मानवीय बलात्कार (आर्टिफिशियल इनसेमिनेशन) द्वारा पैदा हुआ, नर बछड़ा/कटड़ा, कसाई के पास भेजा जाता है और दूध देने से फ़ारिग होकर गाय/भैंस/बकरी भी कसाई के पास ही भेजी जाती है।

तो सर्वाहारियों को मांस की खेप कौन दे रहा है? डेयरी का सेवन करने वाले शाकाहारी ही न? तो निर्दोष गुलाम बना कर तड़पाये, इस्तेमाल किये गए जानवर की हत्या के असली ज़िम्मेदार कौन लोग हैं? सर्वाहारी या शाकाहारी?

बुद्धि का प्रयोग कीजिये। जानवरों की खेती करने से 12% ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती है। निर्दोष जानवरों को कष्ट होता है और उनके अधिकारों का हनन भी। जो हम स्वयं के लिए नहीं चाहते, वह हम दूसरे के साथ कैसे कर सकते हैं? अगर करते हैं, तो हमको भी खुद के साथ ऐसा होते हुए देखने की आदत डाल लेनी चाहिए। पुलिस और कानून का लाभ नहीं लेना चाहिये।

अभी भी समय है, निरवैद्यवाद (Veganism) अपनाइये और खुद को निर्दोष, दयालु, सकारात्मक, पर्यावरण प्रेमी, पशुप्रेमी, ज्ञानी, बुद्धिमान और स्वास्थ बनाइये। (सलाह है कोई आदेश नहीं) ~ Shubhanshu Dharmamukt 2020©

Harmful positive thinking is also negativity.


सकारात्मक शब्द स्वीकार से बना है। यानि किसी भी बात को स्वीकार कर लेना सकारात्मक है और नकार देना नकारात्मक। हम प्रायः नकारात्मक सोच जिसे कहते हैं दरअसल वह हर बात में 'नुकसान ही होगा' ऐसा सोचने की धारणा है। जबकि ऐसा सम्भव ही नहीं कि हर बात में नुकसान ही होगा।

कहीं हम इस धारणा के चलते लाभदायक बातों/मौकों को छोड़ न दें, इसलिए सकारात्मक सोच पर ज़ोर दिया जाता है। इसकी बारीकियों को इसलिये नहीं बताते क्योंकि मानव को औसत बुद्धि का तो मानते ही हैं जो कम से कम सही और गलत को पहचान ही लेगा।

सकारात्मक सोच के चलते यदि आप हर बात को जांचने की भी सोच रहे हैं तो भी आप कम खतरा उठाइये। जैसे किसी ने ईश्वर की अवधारणा दी तो आप कुछ समय तक उसे स्वीकार करके जांच कीजिये। सही या गलत का फैसला ले लेंगे। इस तरह से सकारात्मक सोच फायदा ही करेगी लेकिन यदि आप किसी के द्वारा दिये गए धोखे, धक्के, चप्पल को अपने मुहँ पर स्वीकार कर लेंगे तो आपको तकलीफ और नुकसान हो सकता है। अतः देख समझ कर सकारात्मक बनिये।

मान लीजिये कोई आपको आपकी गेंद मारने का प्रलोभन दे और आप 'ये क्या होता है' जानने के चक्कर में 'खोल के झुक गए' तो वो आपकी फाड़ भी सकता है। अतः ये सकारात्मक सोच भारी पड़ सकती है।

इसी तरह अगर कोई lockdown में आपको सहायता राशि और राशन दे और आप उसे नकार दें तो आपके लोढ़े लग सकते हैं।

सकारात्मक और नकारात्मक सोच आपके विवेक से तय होती है। शक करना नकारात्मकता है लेकिन जांच करना सकारात्मक है। अतः शक कीजिये लेकिन जांच भी कीजिये। तभी सकारात्मक सोच लाभ देगी अन्यथा आप अगला जो देगा स्वीकार लोगे तो या तो आपको गुलाब मिल सकता है या कोई आपके लोढ़े लगा सकता है। लगवाना या नकारना उस समय आपकी सकारात्मक सोच होगी।

अतः जो भी सोच आपको लाभकारी प्रतीत हो वह सकारात्मक है और जो सोच आपको नुकसान पहुँचाये वह सकारात्मक होकर भी नकारात्मक सोच है। ~ Shubhanshu Dharmamukt 2020©

सोमवार, अप्रैल 13, 2020

Why Motherhood is Nothing Without Marriage?



लड़की: मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनना चाहती हूँ।
शुभ: तुम माँ क्यों बनना चाहती हो?
लड़की: मैं मातृत्व अनुभव करना चाहती हूँ। मैं अपने बच्चे को प्यार से पालना चाहती हूँ। उसे अपने सीने का दूध पिलाना चाहती हूँ। प्रसव पीड़ा को महसूस करना चाहती हूँ।
शुभ: अपने बच्चे? अभी तो कह रही थीं कि 'मेरे बच्चे' की माँ बनना है, और अब तुम्हारा हो गया?
लड़की: मेरा मतलब हमारे बच्चे को पालना चाहती हूँ।
शुभ: लेकिन तुमने मुझसे तो पूछा ही नहीं कि मुझे बच्चे चाहिए या नहीं?
लड़की: सबको बच्चे चाहिए, तुमको क्यों नहीं चाहिए?
शुभ: किसी समझदार को बच्चे नहीं चाहिए।
लड़की: मुझे तो चाहिए।
शुभ: तुमको भी नहीं चाहिए। तुम झूठ बोल रही हो या समझदार नहीं हो। 😜
लड़की: पागल हो क्या? मुझे क्या पड़ी है झूठ बोलने की? मैं तो शुरू से कह रही हूँ कि मुझे माँ बनना है और बच्चा चाहिए मुझे।
शुभ: मतलब मैं तुमको प्रेग्नेंट करके, तुम्हारे हाल पर छोड़ के चला जाऊं? 🙄
लड़की: ऐसे कैसे? पहले शादी करो।
शुभ: पहले तय करो, तुमको बच्चा चाहिए या फ्री का घर, sex, सुरक्षा और गुजारा भत्ता चाहिए?
लड़की: मर भो*ड़ी के, तू तो कुछ ज्यादा ही चालू है साला! Sex तो साला हर कोई, आंख मारते ही करने को कूद पड़ता है, लेकिन होता उनसे कुछ भी नहीं। इधर गर्मी चढ़नी शुरू होती है उधर साले आग पर अपना पानी फेर के पूछते हैं, "मजा आया न बेबी?" भो*ड़ी के, तू कौन सा मुझे चाँद-तारे दिखाने वाला है? तू भी सबके जैसा ही निकलेगा। अकेले तेरे बच्चे का क्या अचार डालूंगी? उसी को तो गोद में लेकर तुझे ब्लैकमेल करना था। तेरे वंश के चलने के लालच में तू मेरे आगे पीछे डोलता। तुझे तो वंश ही न चलाना है। क्या करेगा इतने पैसे का? दान करेगा या सब उड़ा देगा मरने से पहले? सारे प्लान की वाट लगा दी। बच्चा किसे चाहिए भो*ड़ी के? बच्चा मेरी जूती पे। सोचा था, फ्री में मजे करने का इंतजाम हो जाएगा। छोड़ भी देगा तो अपनी कमाई का 30% मुझे पेंशन के रूप में देता रहेगा। अब साला फिर से नौकरी ढूढो अब।
शुभ: देखा, बच्चा किसी को नहीं चाहिए। सबको पैसा चाहिए। जिसे दूसरों को देकर मजे कर सको। मैं अपने तरीके से ईमानदारी से कमा रहा हूँ और आप को एक आलसी कम्युनिस्ट की तरह सब कुछ free में चाहिए। वो भी धोखाधड़ी से। जी हाँ विवाह धोखाधड़ी है लेकिन कुछ *तियों को दान करने की जगह अपना 'शाही' राजवंश चलाना है। उनको इसी धोखे की ज़रूरत है। उनको विवाह करना है। वे उसी 'भाबी जी घर पे हैं?' के सक्सेना के जैसे हैं जो बिजली का नँगा तार पकड़ के बोलता है, "I like it!" और हाँ, मुझे सबके जैसा मत समझना, एक बार परफॉर्मेंस देख लेगी न? तो पागल हो जाएगी! 😌 ~ Vegan Shubhanshu Dharmamukt 2020© 2020/04/13 18:07

शनिवार, अप्रैल 11, 2020

I am the master of the world ~ China



चीन बहुत पहले से एक प्रतिभाशील देश रहा है। कागज, कागजी मुद्रा, बारूद, चाय और न जाने कितनी खोज और आविष्कार आदिकाल से उधर हो रहे हैं, बिल्कुल अमेरिका की तरह। आविष्कार और खोज के दम पर ही अमेरिका महाशक्ति बना है। उसकी ही राह पर चीन चल रहा है। जब से माओवादी विचारधारा ने चीन में घर किया तब से चीन का सपना पूरे विश्व पर कब्जा करने का रहा है।

भारत पर हुआ चीनी हमला कोई आम हमला नहीं था। सबसे पहले पड़ोसी देश ही शिकार बनाये जाते हैं। लेकिन जिस तरह से रूस और अमेरिका ने भारत की मदद की है, चीन कमज़ोर पड़ गया था। अब उसकी नज़र अमेरिका और उसके सहयोगी देशों पर आ टिकी।

रूस ने खुद ही एक चाल चली थी और ताशकन्द समझौते के समय ही शास्त्री जी की रहस्यमय हत्याकांड रूपी मृत्यु ने चीन को समझा दिया कि रूस मित्रघाती है और उससे डरने की ज़रूरत नहीं। इसकी जगह पाकिस्तान से हाथ मिलाने में फायदा है। दोनो देश बारी-बारी से हमला करके नाकाम रह चुके थे। साथ मिल कर वे ज्यादा ताकतवर बन सकते हैं।

मुद्रा/निजी सम्पत्ति के खिलाफ बने सिद्धान्तों के बावजूद उस देश ने अपनी मुद्रा चीनी डॉलर बनाई। सबसे पहले कागजी करेंसी भी इसी देश के किसी नागरिक ने बनाई थी क्योंकि कागज ही इधर ही बना था। फिर तेजी से उसने जनता से जबरन कार्य करवा कर साम्यवादी सिद्धान्तों के अनुसार, उसकी वास्तविक मेहनत का मूल्य उनको देने की जगह उनके योगदानों, आविष्कारों को छीन कर चीन, खुद एक बड़ा पूंजीपति तानाशाह बन कर उभरा। हालाँकि अलीबाबा ग्रुप का मालिक संघर्ष करके चीन का सबसे बड़ा अमीर व्यक्ति बन चुका है। जो चीन की साम्यवादी विचारधारा की धज्जियाँ उड़ाता दिखता है।

चीन, आविष्कार करने वाले को कुछ न देने के कारण, आविष्कार को लागत मूल्यों पर बना कर व मनमाने दाम पर बेच कर शुद्ध मुनाफा कमा सकता है। इसलिये उसने 'जनता कमज़ोर, सरकार/देश मजबूत' की अवधारणा पर कार्य किया। इसी के चलते वह साम्यवादी विचारधारा के लिये विश्व की ही पूंजीवादी व्यवस्था से विश्व को काटेगा। वह आज दुनिया में अमीर देशों में दूसरे नम्बर पर है।

प्रजातंत्र में आविष्कार/खोज/रचनात्मक कार्य करने वाले इंसान को जीवन भर सम्मान राशि के साथ उसकी खोज को उसकी निजी सम्पत्ति मान कर, उसके मर्जी के मूल्य पर, उस वस्तु के खरीदने, बेचने और बनाने के अधिकार खरीदे जाते हैं। जिसके कारण प्रतिभाशील लोग शीघ्रता से अमीर हो जाते हैं।

जबकि अनुमानित रूप से एक साम्यवादी तानाशाह, लोगों के आविष्कार छीन कर, लोगों से जबरन ऐसे एफिडेविट पर हस्ताक्षर करवाता है जिसमें लिखा होता है कि आविष्कारकर्ता/खोजी/कलाकार ने स्वेच्छा से देश के लिये अपना खोज/आविष्कार/रचनारूपी योगदान निष्काम भाव से कर दिया है। अन्यथा की स्थिति में मृत्यु दंड या जेल की सज़ा होगी।

UN के गठन के बाद हुए युद्धों की नाकामी से आग्नेयास्त्र वाले युद्ध की बात अब पुरानी हो चुकी है। सेना, बस अब एक शो पीस की तरह रह गई है। बहुत से देश कभी पहले युद्ध न करने की संधि पर हस्ताक्षर कर चुके हैं। इस दशा में कोई भी एक युद्ध विश्वयुद्ध बन जायेगा। सन्धि के अनुसार यदि किसी भी देश ने, किसी भी देश पर अगर हमला किया तो UN से जुड़े समस्त देश, उस देश पर हमला करके, उसे कब्जे में ले लेंगे। अमेरिका सबसे ज्यादा संपन्न होने के नाते, इनमें सबसे अधिक सहयोगी देश दिखाई देता है। लोग इस अग्रणी मददगार को स्वतः सामने आने के कारण, अमेरिका को घमण्डी मानते हैं और इसे दादा कह कर उसके ऊपर ताना मारते हैं।

अमेरिका की राजनीति भी 2 दलीय है। प्रधानमंत्री की जगह राष्ट्रपति समस्त कार्य देखता है और वे ज्यादा सफल भी हैं। हमारे लोकतंत्र में संविधान की प्रस्तावना अमेरिकी है जबकि संविधान में कुछ गड़बड़ी पैदा करके भारत को उल्टा लोकतांत्रिक देश बनाया गया। जनसंख्या और संस्कृति की दलील देकर, यहाँ बहुदलीय चुनाव व्यवस्था है। कोई भी मुहँ उठा के चुनाव दल बना लेता है और राजनीति के बहाने धन लूटने की फिराक में लग जाता है।

जनता वैसे भी भोली है और उन्हीं में से निकला एक बहुजन व्यक्ति यहाँ राष्ट्रपति के रूप में हस्ताक्षर करने और पुरुस्कार देने के आलावा कुछ नहीं करता। सब काम प्रधानमंत्री पर डाल दिया जाता है।

कुछ सार्वजनिक कार्य न करने के चलते राष्ट्रपति का भी मजाक बनाया जाता है। जबकि यही राष्ट्रपति जब atrocity act में तुरंत गिरफ्तारी से पहले जांच के नियम को सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ जाकर नामंजूर कर देता है, तब भी जनता में उसकी ताकत अपना असर नही दिखाती। कोई धन्यवाद रैली या समारोह नहीं होता। जबकि प्रधानमंत्री का तो मजाक उनकी व्यक्तिगत हरकतों से उड़ता रहता है। कभी वो थाली बजवाते हैं, तो कभी दिए जलवाते हैं। जनता तुरन्त प्रतिक्रिया देकर अपना प्रेम उनके प्रति दर्शा देती है। बिना जाने कि इससे क्या लाभ होगा? अंधविश्वास में डूबा, अक्लविहीन देश। क्षमा कीजिये, सबके लिए नहीं कहा।

वर्तमान में, पूरी दुनिया चीन के द्वारा फेंके गए bio bomb से जूझ रही है। यही उपाय था इस समय विश्व युद्ध के लिये। तमाम फिल्में और किताबें इस तरह के खतरे से आगाह कर रही थीं लेकिन लोग तो फ़िल्म को फ़िल्म समझ कर अय्याशी में लगे रहे।

चीन के वुहान व एक अन्य शहर में वायरस फैलता है और बाकी पूरा देश सुरक्षित रहता है। जबकि पूरा विश्व इसकी चपेट में आ जाता है। हर देश में 1 या 2 केस मिल ही गए। ऐसा कैसे संभव है?

अचानक खबर आती है कि चीन से संक्रमण का data आना बंद हो गया है। संक्रमण हुए मरीज, स्वस्थ हुए मरीज, और मरने वाले मरीज, सभी का डेटा एकदम गायब?

जबकि इटली और अमेरिका में एकदम से इस वायरस ने हजारों हत्याएं कर डाली हैं। अभी अन्य कई देश भी बर्बादी की ओर बढ़ रहे हैं। lockdown से जहाँ संक्रमण कम किया जा रहा है, दूसरी तरफ़ कार्य और उत्पादन न होने से सभी देश अपना खजाना मुफ्त में वेतन देने के लिये खोल रहे हैं। गरीब जनता को अमीर लोगों से लिया गया दान और सरकारी खजाना, मुफ्त में भोजन व राशन दे रहा है। इलाज और टेस्ट के लिये महंगी दवा व परीक्षण किट विदेशों से खरीदी जा रही है।

आपातकाल सेवाओं के कर्मचारियों को दोगुना वेतन दिया जा रहा है। अमीरों के खजाने गरीबों के पास जा रहे हैं। चीन ने रोबिन हुड की तरह अमीरों के खजाने गरीबों के लिए खुलवा दिए। साम्यवाद दिखने लगा है। lockdown तानाशाही से कम नहीं है और 112 नंबर वाली पुलिस अब राशन के साथ लोगों की अजीबोगरीब मांगें भी पूरी कर रही है। साम्यवादी आहट दिखने लगी है। धन और भोजन देने का ही नियम होता है साम्यवादी सोच में और जाने अनजाने हम उसी पर चल रहे हैं। बस एक कमी है। कार्य कोई नहीं कर रहा। पुराना धन बंट रहा, नया आ ही नहीं रहा। यह वैश्विक आर्थिक मंदी का समय है।

पहले भी सबसे पहले अमेरिका बर्बाद हुआ था मंदी से और इस बार तो सब चपेट में हैं। सारे देश इस समय अजीब परिस्थिति में पड़े हैं और अचानक खबर आती है कि चीन में lockdown खत्म होने की खुशी में ख़रगोश मार के दावत दी जा रही है। सरकार फेस्टिवल की तरह खुशी मना रही है। चीन से वायरस पूरी तरह समाप्त हो गया? ये क्या बकवास है?

अगर चीन ने कोई तरीका खोज लिया है, इससे बचने का, तो WHO हाईड्रोक्सिक्लोरोक्विन जैसी प्रोटोजोआ नाशक मूर्खता पूर्ण दवा का वायरस पर परीक्षण क्यों कर रहा है? एक बच्चा भी जानता है कि वायरस को उसकी वैक्सीन ही मार सकती है। फिर भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत से मलेरिया की दवा FDA से कोरोना वायरस के लिए स्वीकृत बता कर जबरन मांगते हैं। भारत मान भी जाता है। फिर पता चलता है कि ये मांग ट्रम्प अपने निजि फायदे के लिए मांग रहे थे। FDA मुकर गया।

एक शिक्षक ने छात्र से कहा, सामने श्यामपट्ट पर 2 रेखाएं बनी हैं। अगर एक रेखा को छोटी करना हो तो तुम चाक या डस्टर की मदद से क्या करोगे?

राम ने एक रेखा डस्टर से मिटा कर छोटी कर दी और श्याम ने चाक से एक रेखा दूसरे से लम्बी कर दी। श्याम को इनाम मिला और राम को मुर्गा बनाया गया।

चीन अमीरी में दूसरे स्थान पर है और उसे पहले पर आने के लिये केवल एक नीच कार्य करना था, जैसे बाकी देशों की अर्थव्यवस्था बर्बाद कर दी जाए। चीन पहले भी वैश्विक मुद्रा में छेड़छाड़ करके विश्व की मुद्रास्फीति दर को बर्बाद करने के प्रयास करने का दोषी पाया गया था और उस पर प्रतिबंध लगे हैं। चीन उपरोक्त कहानी का राम है। इसे मुर्गा कौन बनाएगा?

वायरस बम से हमला करने के बाद क्यों न इससे भी मुनाफा कमाया जाय और वेंटिलेटर, मास्क, दवाई, और जांच किट बेच कर सारे देशों से व्यापार कर लिया जाए? उनका कीमती धन चीन के पास खिचेगा और चीन का घटिया सामान उनके पास। कोरोना की दहशत फैलाई जाए और दादा अमेरिका नहीं, अब वह है, ये चेतावनी सबको बिना शोर मचाये समझा दी जाए।

ये हो क्या रहा है? सच तो यह है कि अमेरिका, भारत, इटली, जापान जैसे तमाम देश अब हथियार डाल चुके हैं। चीन का हमला हुआ है। चीन ने खुद बच कर ये साबित कर दिया है कि ये सब उसकी सोची-समझी रणनीति थी। जल्दी ठीक होकर और खुद को ठीक करने के राज गुप्त रख कर उसने मूक चेतावनी दे दी है कि वह हिंसा की रणनीति से पीछे नहीं हटा है और कोई ताकत उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। अहं ब्रह्मास्मि ~ चीन।
लेखक: वीगन Shubhanshu सिंह चौहान 2020© (डिस्क्लेमर: लेखक के निजी विचार। लेखक कोई दोषारोपण या दावा नहीं करता। ये उसके अपने विचार हैं जो समय और प्रमाणों के साथ बदल भी सकते हैं।) 2020/04/11 16:56

शुक्रवार, अप्रैल 10, 2020

विरोध कैसा हो? ~ ज़हरबुझा सत्य




विरोध कैसा होना चाहिए?

1. सुबूतों और तर्कों के आधार पर।

2. अनुमान केवल सावधानी हेतु लगे हों, न कि जबर्दस्ती नफ़रत पैदा करवाने वाले।

3. बकलोली न हो कतई। उतना ही बोलिये जिसका जवाब सुबूत और तर्क से दे सको।

4. निष्पक्ष हो, अंधविरोध न हो। ऐसी धारणाएं जो कहें कि अगला जो भी करेगा, गलत ही करेगा, मूर्खतापूर्ण है। दरअसल ऐसा केवल घटिया राजनीतिक लोग करते हैं जिनको हमेशा विरोधी पार्टी के लोग अपनी राह के कांटे ही दिखते हैं।

वास्तव में वे हैं भी। क्योंकि जब तक अगला अच्छा कार्य करेगा तब तक वह सत्ता में रहेगा और तब तक क्या विपक्षी पार्टी अंडे देगी? इसलिये वह गंदी राजनीति पर उतर आते हैं।

लेकिन हम जैसे निष्पक्ष लोग इनको पल भर में पहचान कर इनको इनकी सही जगह पर पहुँचा देते हैं। इंसान ही रहिये। धन का लालची बन कर इंसानियत मत भूलिये। सही को सही और गलत को गलत कहना ही धर्मजातिमुक्त और वास्तविक बुद्धिमान इंसान होना है। जो आज कोई बनना ही नहीं चाहता। ~ Shubhanshu Dharmamukt 2020©

गुरुवार, अप्रैल 09, 2020

आप ही एक्सपर्ट हैं। ~ ज़हरबुझा सत्य

धर्म/धम्म/पंथ की दुकानें सजी हैं। मेरा माल best है, यही सबको लगता है। दरअसल हर कोई अपनी सोच को दूसरों पर थोपने के लिये किसी बड़ी हस्ती का सहारा लेता है, जैसे अमिताभ, शाहरुख, सलमान, कैटरीना, करीना आदि वैसे ही अल्लाह, शिव, विष्णु, बुद्ध, महावीर, यीशु, योहोवा, आदि धर्म के विज्ञापनों में अपनी मुहर लगा कर उनके उत्पादों को महत्वपूर्ण बताते हैं। लेकिन ये भूल जाते हैं कि ये उदाहरण एक बात साफ बता रहे हैं कि 96 प्रतिशत 'धन कमाने' वाले लोग अपनी बुद्धि से चलने की जगह किसी एक्सपर्ट की बुद्धि पर भरोसा करके अपना जीवन जीते हैं। और ये बात भी भूल जाते हैं कि एक्सपर्ट बिकाऊ और मूर्ख भी हो सकता है।

अतः खुद की बुद्धि भी इस्तेमाल कर लें, क्या पता आप ही असली एक्सपर्ट हों? आखिर आपके लिए ही तो उत्पाद बनाये जाते हैं। घड़ी डिटर्जेंट की एक लाइन वाकई प्रेरणास्रोत है, पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें। ~ Shubhanshu Dharmamukt 2020©

गणित आपको निजी जीवन में बुद्धिमान नहीं बनाती ~ ज़हरबुझा सत्य




मैं कभी समझ नहीं पाया कि जो लोग प्रायः गणित में अच्छे होते हैं वे अपने बाकी जीवन में प्रायः मूर्ख क्यों दिखते हैं? क्या गणित जीवन जीने के लिये पर्याप्त नहीं है? शायद नहीं। गणित सीखी जाती है। बुद्धि जन्म से होती है। 10 वर्ष की आयु तक विकसित होती है।

प्रश्न: मुझे कैसे पता चला?

उत्तर: लोगों के विचार, बातें और समस्याओं ने बताया। उन्होंने ही बताया कि वे गणित में बहुत अच्छे हैं लेकिन अन्य विषयों और जीवन में इतने बुद्धिमान नहीं हैं कि समस्या का खुद हल ढूढ़ सकें। इसलिये उन्होंने मुझसे आकर हल मांगे।

प्रश्न 2: बहुत से विद्वान लोगों को गणित के कारण ही बड़ी सफलता मिली और वे प्रसिद्ध हुए। क्यों?

उत्तर: बिल्कुल, तभी ये पोस्ट बनाई गई है। गणित हम क्यों पढ़ते हैं? इसी के उत्तर में सारा रहस्य छुपा है। गणित की पढ़ाई, हम प्रायः नौकरी पाने के लिये करते हैं। नौकरी यानि बहुत से ऐसे कार्य जिनका इस्तेमाल आधुनिक सुविधाओं के लिये होता है। उनमें आपका इस्तेमाल कैलकुलेटर की तरह करने का कार्य। ब्रह्माण्ड के रहस्यों को सुलझाने, तर्क करने के गणितीय तरीकों से बहुत से रहस्य समझने में सफलता मिली है।

गणित इस दुनिया के विज्ञान का आधार है, लेकिन इसे विद्यालय में समझने भर से आप किसी उद्योगपति के लिये उपयोगी बनते हैं न कि खुद के लिए। खुद के लिये उपयोगी बनने के लिए आपको कुछ नया खोजना होगा। वो करना ही बुद्धिमान होने की ओर एक कदम है।

इससे पहले तो आप केवल एक मेमोरी (स्मृति) मशीन हैं जो नियतांक, log, त्रिकोणमिति के मान, आदि रट कर उनकी मदद से गणना कर लेते हैं। इससे कुछ नया नहीं बनता। असली जीवन में इसका कोई कार्य ही नहीं है। 

आप कोई अनुसंधान में नहीं हैं। आप साधारण इंसान हैं और तब ये आपके जीवन में हिसाब-किताब रखने से ज्यादा कुछ काम का नहीं रह जाता। अतः आप ग़लतियों का ढेर लगा सकते हैं। गणित का कार्य अगर सबकुछ सिखाना होता तो आपको 5 या 7 विषय एक साथ न पढ़ाये जाते।

जिन लोगों ने गणित से प्रसिद्धि पाई, अधिकांशतः वे ईश्वर को मानते रहे। क्या ये उनकी बुद्धि की सीमा को नहीं दर्शाता? क्या गणित से वे ईश्वर को साबित कर सके? नहीं, फिर भी उसे मानना मूर्खता नहीं तो क्या है? 😊

जबकि IQ में गणित की बड़ी भूमिका होती है। 🤣

😊 अब मुझे तो गणित ठीक से नहीं आती। न किसी ने सिखाई और न ही रुचि थी। फिर भी जीवन में अपनी समस्याओं को हल कर लेता हूँ। मेरे अनुमान से गणित का बुद्धिमान होने से कोई लेनदेन नहीं है।

बुद्धिमान इंसान भी गणित सीख सकता है और एक औसत बुद्धि का मानव भी।

जिनके मस्तिष्क का आधा हिस्सा (तर्कवादी और गणनात्मक) दूसरे (कलात्मक) से अधिक विकसित हो वे गणित के क्षेत्र में नई खोज करके पारंगत भी हो सकते हैं लेकिन ज़रूरी नहीं कि अंधविश्वास जैसे मूर्खता से दूर ही हों। ~ Shubhanshu Dharmamukt 2020©

सोमवार, मार्च 30, 2020

Secret plan of communism to undertaking any democratic country




भूखे को भोजन खिलाना है, ये तो धर्मजाति वाले खुद ही लंगर-भंडारा लगा के सदियों से दिखा रहे। कमाने की जगह मुफ्त का माल उड़ाने और धर्म की दलाली की हवस जगा रहे। कोई भूखा क्यों है? सवाल ये है।

मैं भूखा हूँ क्योंकि मैं कमाने का प्रयास नहीं करता। मैं मुफ्त का भोजन भंडारे और लंगरों से खाता हूँ। मुझे कमाने की क्या ज़रूरत? अब कोरोना के चक्कर में लंगर-भंडारे बन्द हैं तो हाँ मैं भूखा हूँ। ~ एक भूखा

कोई भूखा है तो उसे भोजन देने से वो आत्मनिर्भर बनेगा या उसको भूखा छोड़ दें तो कोई कार्य करके वह खुद कमाएगा? याद रखिये, मरना कोई नहीं चाहता है।

प्रश्न: सरकार द्वारा निर्धारित प्रतिदिन की मजदूरी कितने रुपये है और मजदूर कितने रुपये मांगते हैं आपसे?

उत्तर: 350₹ से 500₹

रोज कमाने खाने वाले लोग बोलते हैं कि कभी-कभी 15 दिन तक कोई कार्य नहीं मिलता। फिर कहते हैं कि हम एक दिन न कमाएं तो भूखों मरने लगते हैं। ऐसा कैसे? 🤔

कम मजदूरी के केस में कानून खरीदने के आरोप वालों से सवाल:
अरबो खरबों रुपये रिश्वत में देने वाला 100₹ मजदूरी काहे नही दे रहा?

अगर एक लोकतांत्रिक देश में कट्टर साम्यवाद लाना है तो क्या करना होगा? इसका एक मास्टर प्लान है। ये प्लान मैं आपको बताऊंगा। पूरा प्लान धोखाधड़ी और गरीबों के खून से रंगा निर्दयी षडयंत्र है।

साम्यवाद लोकतंत्र के एकदम विपरीत होता है। अतः आपको इसे लाने के लिये कुछ भी करके लोगों के मन में लोकतंत्र के प्रति घृणा भरनी होगी। देखिये, कौन लोग आपको लोकतंत्र के खिलाफ भड़का रहे हैं?

किसी भी देश के 3 महत्वपूर्ण वर्ग होते हैं; मजदूर, किसान और आदिवासी। जिनके पास शारीरिक ताकत अधिक और मानसिक ताकत (शिक्षा) सबसे कम होती है। इनको भड़का कर देश में गृह युद्ध करें। अमीरों को लूट कर धन एकत्र करके उससे निर्देशित साम्यवादी सरकार बनाइये।

आदिवासी, किसान और मजदूरों को अन्य साम्यवादी देश बंदूकें, गोलाबारूद उपलब्ध करवाएंगे ताकि पुलिस और सेना से मुकाबला कर सकें। मरने वालों को लूटो और उनसे और गोला बारूद लेकर उन्हीं को मार डालो।

गोरिल्ला युद्ध से सैनिकों को तब मारो जब वे असावधान और थके हुए, नींद में हों। उनकी वर्दी चुरा कर पहनो और उनके भेष में उनको और मजदूरों, किसानों और आदिवासियों की औरतों और बच्चों को बलात्कार करके नृशंस हत्या कर दो ताकि इनके जवान पुरुष आंख बंद करके सेना को मार डालने के लिये टूट पड़ें।

जब कोई साम्यवादी जवान मारा जाय तो अपने ही मरे हुए साथी की आंखें निकाल लो और शव की बुरी दशा कर दो ताकि जो उसे देखे नफरत से सेना और पुलिस के खिलाफ टूट पड़े।

जितना ज्यादा इनके दंगे में लोकतांत्रिक सरकार इनका दमन करेगी उतना ही हम इनकी लाशें व चोटें दिखा कर इनके बच्चों और साथियों को भड़का सकते हैं। इनको कॉमरेड बुलाइए ताकि इनको लगे कि वे सैनिक हैं और देश को आज़ाद करवा रहे हैं। इस तरह इनको हत्या और बलात्कार करने में कोई शर्म नहीं आएगी। इनकी इंसानियत उच्च संपन्न वर्ग से घृणा द्वारा खत्म कर दो।

अगर आप एक साम्यवादी हैं और चाहते हैं कि लोकतंत्र के खिलाफ सड़कों पर जंग हो तो क्या आप मजदूरों को न्याय दिलवा कर लोकतंत्र के प्रति प्रेम पैदा करेंगे या उनको बर्बाद कर देंगे ताकि वे विद्रोह करें?

साम्यवादी नेता ही मजदूरों को न्याय नहीं मिलने दे रहे क्योंकि अगर मिल गया तो विद्रोह कैसे होगा लोकतंत्र के खिलाफ? मजदूरों को ही शिक्षा और संपन्नता नहीं मिलती तभी आसानी से भड़का कर उनको कॉमरेड सेना बनाया जा सकता है।

एक फैक्ट्री मालिक क्यों निर्धारित से कम मजदूरी देकर अपनी फैक्ट्री पर ताला लगवाना चाहेगा? क्या उसे डर नहीं लगता मजदूरों से? सीधी से बात है ये सब साम्यवादियों का षड्यंत्र है जिसके कारण ऐसा दर्शाया जाता है।

साम्यवादी होने के नाते आपका फर्ज है कि एक भी मजदूर चैन से न जी सके। उसकी बर्बादी होगी, तभी सड़कों पर खूनी लाल सलाम क्रांति आ सकती है। उनको दर्द दो, वो साम्यवाद लाएंगे।

साम्यवादी होने के नाते आपको पुलिस के प्रति घृणा भरनी होगी क्योंकि यही लोकतंत्र की पहली कड़ी हैं। न्यायव्यवस्था में साम्यवादी भर्ती करो और खूब भ्रष्टाचार करो। ताकि कानून से भरोसा उठ जाए।

लालबहादुर शास्त्री साम्यवाद के खिलाफ थे इसलिये उनकी रूस (साम्यवादी देश) ने जहर देकर हत्या करवा दी। रूसी मेडिकल रिपोर्ट में अनियमितता मिली थी।

साम्यवाद/समाजवाद अगर संविधान में डाला गया तो ये लोकतंत्र की हत्या होगी। ~ बाबा साहब भीम राव रामजी अम्बेडकर।

शास्त्री जी की मृत्यु के 10 वर्ष बाद समाजवाद संविधान में जोड़ दिया गया। 20 KZB (रूसी खुफिया एजेंसी) एजेंट भारत में उसी समय आये और कभी वापस नहीं गए। ~ ताशकंद फाइल्स (फ़िल्म)

क्या कभी फैक्ट्री मालिक खुद वेतन बांटता है? नहीं न? ये वेतन के घोटाले मजदूर नेता खुद करवाते हैं, वेतन देने वाले मुनीम के ज़रिए। ताकि मजदूर को तंग करके मालिक के खिलाफ भड़काया जा सके।

साम्यवाद देश में अराजकता लाने से आएगा। इसके लिए जनता में सरकार, पुलिस, न्यायालय व कानून (संविधान) के प्रति असंतोष भरना होगा। तभी दँगा होगा जो अमीरों को लूटने मारने में मदद करेगा।

पुलिस को बुरा कैसे बनाया जाए? इसके लिए आप सड़क जाम करो। फिर तब तक कानून का उल्लंघन करो जब तक पुलिस लाठीचार्ज नहीं करती। अब उनसे पिट कर सोशल मीडिया में रोना रोइये।

बिना सुबूत के मुकदमे करो, अपने ही वकील को रिश्वत देकर अपने ही गरीब साथी का केस खराब करवाओ ताकि सब आरोप सरकार, न्यायालय और जज पर लगाया जा सके।

प्लान का दूसरा हिस्सा। आदिवासी समाज को शहरी लोकतंत्र के खिलाफ भड़काने के लिए सेना की वर्दी में आदिवासियों का रेप करके गोली मारो और फ़ोटो खींच कर एक किताब बनाओ।

अब 2 हिस्से में बंट जाओ। 1 हिस्सा सेना को गोरिल्ला युद्ध में खत्म करेगा और दूसरा हिस्सा सेना की वर्दी में आदिवासी समाज पर जुल्म करो। ताकि वो सरकार के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दें।

साम्यवादी झंडे की वास्तविक व्याख्या ये है:
किसान अपना हंसिया और मजदूर अपना हथौड़ा उठाओ और अमीरों का खून ही खून फैला दो। लूट लो उनको। औजार ही हथियार है।
 
कम्युनिस्ट प्लान की जानकारी इन स्रोतों में दर्ज हैं।

1. कार्लमार्क्स और बुद्ध
2. सीक्रेट डॉक्यूमेंट ऑफ माओवाद
3. ब्लैक बुक ऑफ कम्युनिज्म
4. फ़िल्म ऑपरेशन क्रोमाइट
5. फ़िल्म ताशकंद फाइल्स

~ कार्लमार्क्स, माओ, लेलिन, शी जिनपिंग, फ़िदेल कास्त्रो द्वारा निर्मित व निर्देशित। (संकलन कर्ता ~ Shubhanshu 2020©)

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